जयपुर: कोरोना (Coronavirus) के व्यापक संक्रमण ने सभी वर्ग के लोगों में एक भय,चिंता अनिश्चितता एवं अवसाद जैसे लक्षणों को जन्म दिया है. आज हमारे देश में लगभग 14 प्रतिशत लोग किसी ना किसी मानसिक बीमारी से ग्रसित हैं. लगभग हर 20 में से एक व्यक्ति अपने जीवन काल में अवसाद का शिकार होता है और विश्व में हर 40 सेकंड में एक व्यक्ति आत्महत्या को अंजाम देता है. ऐसे व्यक्तियों में इस समय बीमारी के लक्षण बढ़ने का खतरा ज्यादा हो जाता है. 

ऐसे में संक्रमित व्यक्ति जो आइसोलेशन (Isolation) में रहते हैं. उनमें इस तरह के मनोभाव व्यक्ति को ना केवल तनावग्रस्त कर सकते हैं बल्कि कहीं न कहीं उसकी रिकवरी में भी बाधा डालते हैं. आज विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस (World Mental Health Day) पर हमारी सामूहिक जिम्मेदारी बनती है कि हम ना केवल खुद मानसिक तौर पर स्वस्थ रहें बल्कि मानसिक रोग से ग्रस्त व्यक्ति की पूरी सहायता और इलाज़ सुनिश्चित करें. याद रखिए, एक बार जब आप एक विजेता के रूप में इस सबसे बाहर निकल आएंगे तो आप एक कोरोना योद्धा (Corona Warriors) के रूप में फिर से समाज में अपना योगदान देने के लिए तैयार होंगे.

भारत सरकार के ईएसआई मॉडल हॉस्पिटल में मनोरोग विभागाध्यक्ष डॉ. अखिलेश जैन ने बताया ऐसे मनोभाव उत्पन्न होने के कारण. 

हमारे दिमाग में होने वाली इन सामान्य मनोवैज्ञानिक प्रतिक्रियाओं के लिए ज़िम्मेदार पहला और सबसे महत्वपूर्ण कारण है कि हम अपने पास उपलब्ध सूचनाओं और जानकारी का अनावश्यक विश्लेषण कर बीमारी के सबसे घातक संभावित नतीजों का आकलन करते हैं जो चिंता एवम भय पैदा करते हैं. दूसरा कारण अपने मित्रों और अलग-अलग विशेषज्ञता वाले चिकित्सकों से तरह-तरह की सलाहें लेना है, जबकि सभी के अपने अलग अलग अनुभव एवम इलाज़ की प्रक्रिया होती है. 

ऐसे में कई बार भ्रम की स्थिति पैदा हो सकती है जो चिंता और घबराहट बढ़ा सकती है. आइसोलेशन में रहने के दौरान एक और बड़ी परेशानी कोई काम या व्यस्तता का ना होना है. साथ ही किसी से आमने-सामने बातचीत न कर पाना. हम इस तरह रहने के आदी नहीं होते हैं तब स्वाभाविक तौर पर हम इस बीमारी के बारे में और ज्यादा सोचते हैं. नतीज़न हमारा मनोवैज्ञानिक दबाव बढ़ता है. फिर एक और बड़ी चिंता होने लगती है कि एक ही छत के नीचे रहते हुए और अपने रोजमर्रा के कामों को निबटाते हुए अपने परिवार को कैसे सुरक्षित रखा जाए. कभी-कभी इस बीमारी का शिकार बनने का अपराध बोध और दूसरों को संक्रमित करने का डर भी हमारी आशंकाओं और भय को और बढ़ा देता है.

ऐसे में कुछ बातों का ध्यान रख हम इन परेशानियों से बच सकते हैं.
1. चिंता या भय महसूस होने पर विचलित नहीं हों. ऐसी परिस्थितियों में शुरुआत में इस तरह की भावनाएं आना स्वाभाविक हैं. खुद को ये समझाकर शांत रखने की कोशिश करें कि इस बीमारी में रिकवरी की रेट काफी अच्छी है. ये सिर्फ कुछ समय की बात है.

2. कभी भी ऐसा सोचकर तिरस्कृत महसूस न करें कि आपको अलग-थलग रहना है. आइसोलेशन कोई सजा नहीं है बल्कि ये एक अवसर है कि आप खुद को फिर से स्वस्थ करें और दूसरों को भी संक्रमित होने से बचाएं. परोपकार की भावना लाइए कि आप दूसरों को बचा रहे हैं.

3. अनावश्यक एक साथ कई परामर्शों से बचें. विषय विशेषज्ञ डॉक्टर की ही सलाह सुनिए और उन पर विश्वास रखिए. अन्य किसी से सलाह तब ही लें जबकि तमाम कोशिशों को बावजूद स्थिति सुधर नहीं रही हो या और ज्यादा बिगड़ रही हो, वो भी इलाज कर रहे अपने डॉक्टर के संज्ञान में लाने के बाद.

4. सोशल मीडिया पर कई तरह के घरेलू नुस्खे आपस में शेयर किए जा रहे हैं. इन्हें अमल में लाने से पहले अपने विवेक का इस्तेमाल करें.

5. याद कीजिए अब से पहले कब आपके पास इतना खाली समय था ? अब तो आपके पास बहुतायत में वक्त ही वक्त है, तो अगर आपकी शारीरिक स्थिति अनुकूल है और डॉक्टर की अनुमति है तो अपनी दिनचर्या सुधारिए और दिन की शुरुआत हल्के व्यायाम, ध्यान और श्वास संबंधी व्यायाम से करें.

6. पर्याप्त पोषण और तरल पदार्थ का सेवन सुनिश्चित करें, चाहे आपको खाने की इच्छा नहीं हो तब भी. भरपूर पोषण इस संक्रमण से जंग में सबसे अधिक भरोसेमंद संसाधन है जो आपकी प्रतिरक्षा क्षमता बढ़ाकर संक्रमण घटाने में सबसे बड़ा हथियार है.

7. खुद को एक्सप्लोर करें. अपने स्वास्थ्य और उपलब्ध संसाधनों के मुताबिक जो भी आपको करने की इच्छा होती है, निस्संकोच करें. आप जो भी करना चाहते थे, लेकिन समय की कमी के कारण नही कर पाए, तो अब आपके लिए ये सृजन का अवसर है. नाचिए, गाइये, लिखिए, पढ़िए, जो आपको अच्छा लगे, कीजिए.

8. इस समय सोशल मीडिया का उपयोग एक वरदान या अभिशाप हो सकता है, ये इस बात पर निर्भर करता है कि आप इसका उपयोग कैसे करते हैं. दोस्तों, परिवार और प्रियजनों के साथ जुड़ें, अपने नवाचारों को शेयर करें, लेकिन ध्यान रहे भ्रामक सूचनाओं से प्रभावित ना हों.

9. थोड़े- थोड़े अंतराल में पर्याप्त आराम करें क्योंकि यह आपको शारीरिक रूप से तरोताजा कर देगा और इससे आपका दिमाग भी सकारात्मक सोचने के लिए तैयार होगा.

10. धूम्रपान, मदिरा या किसी भी अन्य मादक पदार्थों के सेवन से पूरी तरह बचें। नशा आपकी स्थिति को और खराब करता है.

11.  अपने परिवार के निरंतर संपर्क में रहें और अपनी स्थिति के बारे में उन्हें अवगत कराते रहें. कभी भी अपनी भावनाएं न छुपाएं, खुले मन से सबकुछ शेयर करें.

12.अपने परिजनों के क्रिया कलाप में अनावश्यक मीन मेख ना निकालें क्योंकि ऐसे समय में वे सब भी आपके और अपने स्वास्थ्य को लेकर उतने ही चिंतित हो सकते हैं. एक दूसरे का मनोबल बढ़ाये.

मनोरोगियों को ऐसे समय मे विशेष देखभाल की आवश्यकता होती है
ऐसे समय में डॉक्टर की सलाह ना मिलने तथा स्वास्थ्य सेवाओं का ज्यादा ध्यान कोविड से निपटने में लगे होने के कारण रोगी अपनी दवाइयां नहीं ले पाते, जिससे उनमें रिलैप्स हो सकता है. उनके सोचने समझने की कम क्षमता के कारण वो बचाव के उपाय जैसे सोशल डिस्टनसिंग, मास्क, सैनिटाइजेशन का ध्यान नहीं रख पाते ,ना ही कोविड के लक्षणों को पहचान पाते हैं. ऐसे में जरूरी है कि परिवार वाले व्यक्ति की दवाई देने का ध्यान रखें, चिकित्सक से टेलीफोन या वीडियो कॉल के जरिये संपर्क रखें, रोगी से संवाद बनाये रखें तथा उसके व्यवहार में यदि कोई भी परिवर्तन नज़र आये तो तुरंत चिकित्सक से सम्पर्क करें एवं रोगी को नशे इत्यादि से दूर रखें.

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