Success-Mantra
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Success Mantra:आर्थिक मामलों में महिलाओं की समझ पर हमेशा से सवालिया निशान लगाया जाता रहा है। ऐसे में कोई महिला सिर्फ 25 साल की उम्र में अपनी म्यूचुअल फंड की कंपनी शुरू करने की हिम्मत कर सके तो उसमें जरूर कोई खास बात होगी। वह महिला हैं, राधिका गुप्ता और उनकी कहानी साझा कर रही हैं, रिया शर्मा

शारीरिक विकलांगता किसी को भी तोड़ कर रख देती है। पैदाइश के समय हुई दिक्कतों के कारण राधिका गुप्ता की गर्दन हमेशा के लिए टेढ़ी हो गई। पर, राधिका के लिए यह कभी बाधा नहीं बन सकी। उन्होंने वह हासिल किया, जो वह चाहती थीं। 37 साल की राधिका गुप्ता आज एडलवाइज ग्लोबल एसेट मैनेजमेंट लिमिटेड की मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) हैं। वह पहली भारतीय महिला हैं, जो किसी बड़ी एसेट मैनेजमेंट कंपनी में सीईओ के पद पर पहुंची हैं। उनके पिता भारतीय विदेश सेवा (आईएफएस) के अधिकारी थे, जिस कारण उन्हें अलग-अलग देशों में रहना पड़ा। उनका जन्म पाकिस्तान में हुआ था। जन्म से ही राधिका को विपरीत परिस्थितियों का सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने अपनी चुनौतियों को ही ताकत में तब्दील कर लिया।

पढ़ाई का कोई विकल्प नहीं-
राधिका पढ़ाई में हमेशा टॉपर रहीं। वे एक ऐसे वर्ग से ताल्लुक रखती हैं, जहां परीक्षा में अच्छे नंबर लाना बहुत जरूरी माना जाता है, ताकि एक अच्छा करियर बन सके। पिता के देश-विदेश ट्रांसफर के कारण राधिका को नए माहौल में ढलने के लिए काफी संघर्ष करना पड़ता। फिर उन्हें इंटरनेशनल अमेरिकी स्कूल भेजने का फैसला किया गया। वहां बड़े घरानों के बच्चे पढ़ते थे। एक दिन राधिका ने परेशान होकर अपने माता-पिता से कहा कि वह भी कोई हॉबी अपनाना चाहती हैं। उनके माता-पिता ने उन्हें ब्रिज खेलने की सलाह दी। ब्रिज का खेल, कहा जाता है कि 40 साल से ज्यादा की उम्र वाले लोग ही खेलते हैं। पर, राधिका ने 13 की उम्र में ब्रिज खेलना शुरू कर दिया।

चुनौतियां तो जिंदगी का हिस्सा हैं-
राधिका ने दुनिया के सबसे अच्छे बिजनेस स्कूलों में से एक व्हार्टन (पेंसिलवेनिया यूनिवर्सिटी) से 2005 में बी.एससी. (इकोनॉमिक्स) की डिग्री की थी। व्हार्टन के फाइनल ईयर में उन्होंने कैंपस में आए आठ संस्थानों में अप्लाई किया। छह संस्थानों ने उन्हें तत्काल रिजेक्ट कर दिया। सातवें से भी जब रिजेक्शन का फोन आया, तो वह टूट गईं। उनमें खुद को खत्म कर लेने के विचार आने लगे। उनकी दोस्त को जब ये पता चला तो उसने और वहां हॉस्टल के अधिकारियों ने मिल कर राधिका को एक अस्पताल के मनोचिकित्सा वार्ड में पहुंचा दिया। अगले दिन वह किसी तरह वहां से बाहर निकलने में सफल रहीं। फिर उन्हें मैकिंसी एंड कंपनी में नौकरी मिल भी गई।

यूं शुरू हुआ करियर का सफर-
मैकिंसी एंड कंपनी में काम के बाद उन्होंने 2006 में एक्यूआर ग्लोबल एसेट अलोकेशन टीम के साथ भी काम किया। 2008 में जब वैश्विक मंदी का दौर था, राधिका ने अपने दो पार्टनर नलिन मोनिज और अनंत जाटिया के साथ भारत आकर फाइनेंशियल बिजनेस सर्विस  शुरू करने का फैसला किया। वह भारत वापस लौटीं और अपनी बचत (25 लाख रुपये) से अपनी कंपनी ‘फोरफ्रंट कैपिटल’ शुरू की। 25 लाख से शुरू हुआ उनका कारोबार एक साल में दो करोड़ तक पहुंचा। जब उन्होंने अपना बिजनेस एडलवाइज को बेचा, तो वह 200 करोड़ रुपये तक पहुंच गया था। फिर वह 2017 में एडलवाइज की सीईओ बनीं और इस कंपनी का बिजनेस 20,000 करोड़ तक पहुंचा दिया। उनका लक्ष्य 2025 तक कंपनी के कारोबार को दो लाख करोड़ करना है।

हम सब अलग हैं और खास भी-राधिका की यह सफलता दूसरे लोगों के लिए प्रेरणास्रोत है। वह कहती हैं, ‘हम सभी अलग हैं, हम सभी खास है। जीवन में हजार तरह के अनुभव होते हैं। यही अनुभव हमें गढ़ते हैं। अपनी सभी पूर्णताओं का जश्न मनाएं और सभी अपूर्णताओं का जश्न भी मनाएं। जीवन में जो भी सामने आता है, उसका जश्न मनाएं। यही जीवन है।’ नौकरी के लिए छह असफलता का सामना करने के बाद जब मैकिंसी एंड कंपनी में राधिका को नौकरी मिली और उन्होंने कंपनी के लोगों से पूछा कि उन्होंने राधिका को नौकरी क्यों दी तो वहां भी उन्हें यही जवाब मिला था,- क्योंकि तुम अलग और यूनिक हो।

सीख-
-जीवन के अनुभव व्यक्ति को गढ़ने का काम करते हैं।
-हर व्यक्ति दूसरे व्यक्ति से अलग और यूनिक होता है।
-चुनौतियों को अपनी ताकत में तब्दील करके व्यक्ति जीवन में हर सफलता पा सकता है।

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