महिलाएं समाज की जननी हैं लेकिन किडनी रोग से पीडि़त होने के बाद उनकी जिंदगी बचाना मुश्किल हो रहा है। देश में किडनी रोग से पीडि़त केवल दस फीसदी महिलाओं को ही घर के किसी सदस्य द्वारा किडनी दान में मिलती है। जबकि किडनी फेल होने के बाद सिर्फ 5-Eight फीसदी मरीज ही डायलिसिस करा पाते हैं। डब्ल्यूएचओ के अनुसार किडनी रोग की चपेट में आने के बाद 50 फीसदी महिलाओं को ही रोग का समय पर पता चल पाता है। गर्भवती मरीज है तो उसके गर्भस्थ शिशु को भी खतरा हो सकता है।

इसलिए जरूरी स्वस्थ किडनी
किडनी शरीर का अहम अंग है जिसे फंक्शनल यूनिट भी कहते हैं। एक किडनी में करीब दस लाख नेफ्रॉन्स होते हैं। ये शरीर में मौजूद विषैले पदार्थों को यूरिन के जरिए बाहर निकालती है। यह शरीर में तरल का स्तर संतुलित रखती है ताकि पूरे शरीर में पानी की जरूरी मात्रा पहुंच सके। किडनी खून बनाने और इसे फिल्टर करने का भी काम करती है। इसमें विशेष तरह का हार्मोन एरीथ्रोपोएटिन होता है जो खून बनाने की प्रक्रिया को बढ़ाता है। एक स्वस्थ व्यक्ति की किडनी का वजन करीब 150 ग्राम जबकि लंबाई 10 सेंटीमीटर होती है।

देरी से लक्षणों की पहचान
क्रॉनिक किडनी डिजीज (सीकेडी) की चपेट में आने के बाद लक्षण अक्सर देर से ही सामने आते हैं। इसमें सबसे पहले रोगी के चेहरे और पैरों पर सूजन, खून की कमी, भूख न लगना, पेशाब की मात्रा में कमी, शरीर में खुजली होना, शरीर का रंग काला पडऩा आदि लक्षण सामने आते हैं। सीकेडी के रोगी में कार्डियोवैस्कुलर डिजीज की समस्या भी होती है। वहीं महिलाओं को माहवारी के दौरान काफी दर्द और यौन संबंध बनाने में तकलीफ होती है। सीकेडी में किडनी पहले फूलती है फिर सिकुड़ कर धीरे-धीरे बेहद छोटे आकार की हो जाती है।

7,35,000 रोगी देशभर में क्रॉनिक किडनी डिजीज की चपेट में आकर अपनी जान गंवा देते हैं।

2,20,000 लोगों को किडनी प्र्रत्यारोपण की जरूरत है, 15 हजार किडनी ट्रांसप्लांट ही हो पाते हैं।

९०त्न किडनी ट्रांसप्लांट मामलों में किसी करीबी डोनर (ब्लड रिलेशन ) से किडनी ली जाती है।

1971 से 2015 तक देश में 21,395 किडनी ट्रांसप्लांट किए गए, इनमें 783 कैडेवर डोनर से मिले।

three में से एक महिला यूटीआई (यूरिन संक्रमण) से ग्रस्त है दुनियाभर में, यह एक प्रमुख कारण है किडनी कमजोर होने का। पुरुषों की तुलना में महिलाओं में सीकेडी के मामले ज्यादा होते हैं। तकरीबन 27 करोड़ महिलाएं सीकेडी से ग्रस्त हैं।

मददगार जांचें :
किडनी रोग से बचाव के लिए व्यक्ति को रेगुलर किडनी फंक्शन टैस्ट, ब्लड यूरिया, सिरम, ब्लड शुगर, ब्लड प्रेशर की जांचें करानी चाहिए। तकलीफ बढऩे पर सीटी स्कैन, अल्ट्रासाउंड व एमआरआई सेे भी किडनी की स्थिति जानते हैं।

बड़े कारण, जिनसे किडनी का कार्य बाधित होता है

डायबिटीज : महिलाओं में ग्लोमेरुलोनेफ्राइटिस और डायबिटीज मेलाइटस से क्रॉनिक किडनी डिजीज होता है। मधुमेह किडनी का काम बाधित करता है। ग्लोमेरुलोनेफ्राइटिस (ऑटोइम्यून रोग) में किडनी की कोशिकाओं व नेफ्रॉन्स में संक्रमण से उसमें सूजन आती है जिससे रक्त साफ नहीं हो पाता।

हाई ब्लड प्रेशर : लंबे समय से हाई ब्लड प्रेशर से किडनी पर दबाव बढ़ता है। माहवारी या प्रसव के दौरान अधिक रक्तस्त्राव से ब्लड प्रेशर अनियंत्रित हो जाता है। ऐसे में पहले किडनी में रक्तप्रवाह धीमा होता है उसके बाद रक्तप्रवाह पूरी तरह बंद हो जाता है। ऐसे में सडन रीनल फेल्योर के मामले ज्यादा देखे जाते हैं।

प्रेग्नेंसी : कई मामलों में गर्भावस्था के दौरान हार्मोन्स में होने वाला बदलाव एक्यूट और क्रॉनिक किडनी रोग का भी कारण बनता है जिससे ८ प्रतिशत महिलाओं व नवजात बच्चों की मृत्यु हो जाती है। वहीं मेनोपॉज के दौरान शरीर मेें एस्ट्रोजन हार्मोन की कमी से भी सीकेडी के मामले ज्यादा देखे जाते हैं।

एंटीबॉडीज जिम्मेदार:
महिलाओं में किडनी रोग से जुड़ा एक रोग है ल्यूपस नेफ्रोपैथी। इसमें महिला के शरीर में उसी के अंगों के खिलाफ एंटीबॉडीज बनने लगती हैं जो किडनी पर असर करती हैं। ये किडनी की स्वस्थ कोशिकाओं को खत्म कर उस अंग की कार्यक्षमता को घटती है। इसका समय रहते इलाज जरूरी है।

अन्य वजह : यूटीआई, मोटापा, एचआईवी भी महिलाओं में किडनी रोग के लिए जिम्मेदार हैं। जो लोग जोड़ों के दर्द, बुखार व अन्य समस्याओं की दवा बिना डॉक्टरी सलाह के लेते हैं उन्हें भी किडनी रोग की आशंका अधिक रहती है। किडनी का रक्त को साफ करने का काम जब बंद हो जाता है तो किडनी डेड हो जाती है।

 

इलाज की राह हो गई है आसान

आमतौर पर किडनी संबंधी रोगों के इलाज की शुरुआत में दवाओं व डायलिसिस की मदद लेते हैं। लेकिन इनसे राहत न मिलने पर इलाज के कई अन्य तरीके भी अपनाए जाते हैं।

किडनी ट्रांसप्लांट
किडनी फेल होने के बाद गुर्दा प्रत्यारोपण ही आखिरी इलाज है। रोगी का परिजन (ब्लड रिलेशन) अपनी किडनी दान कर उसकी जान बचा सकता है। सीकेडी रोग के सभी रोगियों का समय रहते ही ट्रांसप्लांट होना जरूरी है। वर्ना कुछ समय बाद रोगी की जान बचा पाना मुश्किल होता है। आजकल ओपन, लेप्रोस्कोपिक और रोबोटिक किडनी ट्रांसप्लांट की सुविधा है।

दवाओं-डायलिसिस की मदद
किडनी संबंधी किसी भी प्रकार के रोग के लिए आमतौर पर शुरुआती स्टेज में दवाओं के अलावा रोगी को खानपान में सुधार की सलाह देते हैं। इसके बावजूद यदि किडनी अपना काम पूर्ण रूप से नहीं कर पाती तो डायलिसिस करना पड़ता है।

अन्य ब्लड ग्रुप की किडनी –
स मान ब्लड ग्रुप के डोनर के अभाव में एबीओ इंकॉम्पेटिबल किडनी ट्रांसप्लांट प्रक्रिया अपनाते हैं। इसके तहत प्लाज्मा में से रक्त के भीतर की एंटीबॉडीज को हटाते हैं ताकि उसका रक्त दूसरे ब्लड ग्रुप की किडनी को प्रत्यारोपण के बाद स्वीकार कर ले।

क्रॉस ट्रांसप्लांट : रोगी-डोनर का ब्लड ग्रुप जब मैच नहीं करता है तो एक कानूनी प्रक्रिया को पूरा करने के बाद रोगी की जान बचाने के लिए क्रॉस ट्रांसप्लांट किया जाता है।

कैडेवर ट्रांसप्लांट : इसमें ब्रेन डेड मरीज की दोनों किडनियों को दो मरीजों को लगाकर उन्हें नया जीवन देने का काम हो रहा है। इसे लेकर देशभर में जागरुकता की जरूरत है।

हेपेटाइटिस-सी से संक्रमित गुर्दा भी उपयोगी –
जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने दाता के अभाव में लंबे से किडनी ट्रांसप्लांट का इंतजार कर रहे मरीजों के लिए उम्मीद की किरण जगाई है। उन्होंने हेपेटाइटिस-सी से संक्रमित किडनी रोगी के इलाज का तरीका निकाला व उनकी किडनी को प्रत्यारोपण के जरूरतमंद मरीजों के लिए उपयोगी बनाने का प्रयास किया। 10 हेपेटाइटिस-सी से संक्रमित किडनी रोगी को शोध के दौरान एंटीवायरल दवा दी गई ताकि संक्रमण शरीर में न फैले। ये दवाएं ट्रांसप्लांट के बाद भी १२ हफ्तों तक जारी रहीं। कुछ समय बाद संक्रमण का असर कम पाया गया।

बढ़ती गर्मी से किडनी की कार्यप्रणाली धीमी
जॉर्ज इंस्टीट्यूट फॉर ग्लोबल हैल्थ की एक रिसर्च के अनुसार आमतौर पर तापमान में होने वाले बदलाव से डिहाइडे्रशन और हीट स्ट्रेस की परेशानियां होती हैं। ये समस्याएं भविष्य में क्रॉनिक किडनी डिजीज की आशंका बढ़ा सकती हैं। इसका कारण तापमान में बढ़ी गर्मी से शरीर में होने वाली पानी की कमी है जिससे किडनी की कार्यप्रणाली पर धीरे-धीरे बुरा असर होता है। यह शोध क्लीनिकल जर्नल ऑफ द अमेरिकन सोसाइटी ऑफ नेफ्रोलॉजी में भी प्रकाशित हुआ है।

किडनी को ताकत देते आयुर्वेदिक उपाय

किडनी को स्वस्थ रखने में दवाओं के अलावा आयुर्वेदिक तरीके भी उपयोगी हंै। गोखरू, पुनर्नवा जैसी कई जड़ी-बूटियां किडनी को मजबूत करने के साथ यूरिनरी टै्रक्ट से जुड़ी समस्याओं में भी लाभदायक हैं। आयुर्वेद के अनुसार भी ज्यादा तरल पदार्थ पीना किडनी को सेहतमंद रखता है व ब्लड को भी शुद्व रखता है।

ऊष्णउदक पाण क्रिया के तहत चार गुना पानी को उबालकर एक चौथाई होने पर सुबह के समय गुनगुना पीने से शुद्धिकरण का कार्य बेहतर तरीके से होता है।

जिनकी किडनी फेल हो चुकी है वे महानिंब पेड़ की पत्तियों की सब्जी सुबह-शाम लें, लाभ होगा।
पुनर्नवा, गोखरू व मकोय तीनों को मिलाकर दो लीटर पानी में उबालें। एक चौथाई होने पर इसे दिनभर सामान्य पानी के बजाय पीने से किडनी स्वस्थ रहेगी।

साबुत धनिया रात के समय एक गिलास पानी में भिगोकर सुबह मसलकर, छानकर पीएं। यूरिन संबंधी दिक्कत नहीं होगी।

बढ़ती उम्र के साथ समय पर हो लक्षणों की पहचान तो रहेंगी स्वस्थ और निरोगी

ज्यातादर महिलाएं अपने घर-परिवार में व्यस्त होने के कारण अपनी सेहत पर ध्यान नहीं दे पातीं। ऐसे में उम्र के साथ होने वाले शारीरिक, मानसिक व हार्मोनल बदलाव से कई रोगों की आशंका बढ़ जाती है। व्यायाम, सही दिनचर्या व पौष्टिक खानपान से सेहतमंद रहा जा सकता है। यह तभी संभव है जब महिलाएं अपने लिए समय निकालें।

ये होती दिक्कतें
हार्मोनल बदलाव से अनियमित पीरियड्स की शिकायत, कमजोरी से स्वभाव में चिड़चिड़ापन व थकान, ब्लड प्रेशर, डायबिटीज व तनाव की तकलीफ, कैल्शियम की कमी से हड्डियां कमजोर होना, कमर-जोड़ोंं में दर्द, एस्ट्रोजन कम बनने से मनोरोग, गर्भाशय व ब्रेस्ट संबंधी रोगों की आशंका, मेनोपॉज शुरू होने से हृदय रोगों, एनीमिया आदि की दिक्कत हो सकती है।

2 घंटे दोपहर में बायीं करवट से लेटें, हृदय रोगों से बचाव होगा।

35-40 साल की उम्र के दौरान रोजाना दूध जरूर पीना चाहिए।

अहम कारण
हार्मोन्स में बदलाव होना मुख्य कारण है। इसके अलावा प्रमुख रूप से छोटी-छोटी समस्याओं को नजरअंदाज करना भी बड़ी बीमारी की वजह बनता है। खानपान पर ध्यान न दे पाना, कमजोर इम्युनिटी, पर्यावरण में बदलाव और प्रदूषण भी कई रोगों की आशंका बढ़ाता है। धूम्रपान, जंक फूड और तनाव भी वजह हैं।

ऐसे रह सकती हैं फिट
नियमित संतुलित व पौष्टिक डाइट लें। हरी पत्तेदार सब्जियां व मौसमी फल खाएं। एंटीऑक्सीडेंट्स, कैल्शियम व फाइबर युक्त चीजें लें। 35 से 40 साल की उम्र में रोज दूध पीएं। 45 मिनट वर्कआउट रोज करें। इससे रोगों की आशंका 50 फीसदी घट जाती है। स्विमिंग, एरोबिक्स, साइक्लिंग, रस्सीकूद, वॉक-जॉगिंग करें। तनाव से बचने के लिए योग, प्राणायाम व ध्यान करें। खाली पेट बिल्कुल न रहें। रोजाना Eight घंटे और दोपहर में बायीं करवट से 2 घंटे की नींद लें।

ब्लड प्रेशर की जांच अन्य रोगों से बचाएगी।
मेमोग्राफी टैस्ट से ब्रेस्ट कैंसर का समय पर पता लग सकेगा।
गर्भाशय संबंधी समस्या की पहचान के लिए पैप स्मियर टैस्ट हर तीन साल में कराना चाहिए।
पांच साल में एक बार थायरॉइड टैस्ट।
वजन न बढऩे दें।
हड्डियों की मजबूती का पता बीएमडी टैस्ट से चलता है।

ध्यान रखें : घी के साथ बिना पोलिश के चावल, जौ का दलिया, घी लगी जौ की रोटी, चावल मिश्री घी यदि खाती हैं तो हैल्दी रह सकती हैं।

खुद के लिए कुछ खास संकल्प लेकर रहें फिट

घर परिवार की जिम्मेदारियों के बीच आपको खुद के लिए भी कुछ संकल्प लेने की जरूरत है। इससे आप, अपने साथ परिजनों की सेहत का भी बखूबी खयाल रख पाएंगी। महिला दिवस (Eight मार्च) को यदि आपने सेहत का संकल्प नहीं लिया है तो जानिए अब भी क्या खास कर सकती हैं आप:

रोजाना सलाद खाएं
डायटिंग के चक्कर में शरीर के लिए जरूरी पोषक तत्त्वों से भरपूर चीजों को न भूलें। चिकित्सकीय रूप से भी सभी पोषक तत्त्व एक-दूसरे के साथ मिलकर काम करते हैं।

सेहतमंद रहने के साथ खूबसूरती बरकरार रखने के लिए डेयरी प्रोडक्ट्स, सूखे मेवे और किसी भी रूप में तरल पदार्थ ज्यादा पीएं।

रोजाना एक मौसमी फल खाने की आदत डालें। यदि नहीं खा पा रही हैं तो एक कटोरी टमाटर, खीरा, ककड़ी आदि का सलाद जरूर खाएं।

काम से हटकर कुछ नया करें
सकारात्मक सोच बरकरार रखने के लिए कोई किताब पढ़ें।
छह माह या सालभर में कुछ दिनों के लिए फैमिली संग घूमने जाएं।
बढ़ती उम्र के बारे में ज्यादा न सोचें, खेलकूद में शामिल रखें।
योग, डांस या मेडिटेशन क्लास में खुद का रजिस्ट्रेशन कराएं।
तनाव दूर करने के लिए हंसें। इसके लिए सुबह के समय पार्क में अन्य लोगों के साथ लाफ्टर प्रेक्टिस करें या कुछ देर कॉमेडी वीडियो देखें।

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