18 घंटे पहले

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  • चमोली जिले में 4500 मीटर की ऊंचाई पर मौजूद है काकभुशुंडी ताल, नंदा देवी बायोस्फीयर रिजर्व में आता है ये क्षेत्र
  • काकभुशुण्डि ताल पर बर्फबारी का होना देश में सर्दी की शुरुआत का संकेत है

उत्तराखंड के चमोली जिले में 4500 मीटर की ऊंचाई पर काकभुशुण्डि ताल मौजूद है। ये हिमालयी क्षेत्र की सबसे ऊंची और पवित्र झीलों में एक है। ये करीब 1 किलोमीटर तक फैली हुई छोटी आयताकार झील है। जो हाथी पर्वत के तल पर है। इसका पानी हल्का हरा है। झील के किनारों कई तरह के फूल खिलते हैं। इनसे झील की खूबसूरती और बढ़ जाती है। यह क्षेत्र संयुक्त राष्ट्र की विश्व धरोहर स्थल नंदा देवी बायोस्फीयर रिजर्व में आता है। इस झील का एक रास्ता हिमालय क्षेत्र में जोशीमठ के पास कांकुल दर्रे से भी होकर जाता है। यहां से ये झील करीब 4730 मीटर की ऊंचाई पर है। काकभुशुण्डि ताल के आसपास बर्फबारी शुरू हो चुकी है। यह देश में सर्दी आने का संकेत है।

रामायण से जुड़ी झील
इस झील का जितना प्राकृतिक महत्व है, उतना ही धार्मिक महत्त्व भी है। ये रामायण से जुड़ी हुई है। इसका नाम रामायण के पात्र काकभुशुण्डि के नाम पर रखा गया है। स्थानीय लोगों की मान्यता है कि यहां काकभुशुण्डि ने कौवे के रूप में गरुड़ जी को रामायण की कथा सुनाई थी। सबसे ऊंची झील होने के साथ ही ये पवित्र भी है। माना जाता है कि यहां स्नान के बाद हर तरह के पाप खत्म हो जाते हैं।

काकभुशुण्डि की कहानी
ग्रंथों के मुताबिक लोमश ऋषि के श्राप के कारण काकभुशुण्डि कौवा बन गए थे। श्राप से छुटकारा पाने के लिए उन्हें राम मंत्र और इच्छामृत्यु का वरदान दिया था। इसके बाद उन्होंने पूरा जीवन कौवा के रूप में ही बीताया। काकभुशुण्डि ने वाल्मीकि से पहले ही रामायण गिद्धराज गरूड़ को सुना दी थी।
युद्ध के दौरान जब रावण के पुत्र मेघनाद ने भगवान राम को नागपाश से बांध दिया था, तब देवर्षि नारद के कहने पर गिद्धराज गरूड़ ने भगवान राम को नागपाश मुक्त कराया। भगवान राम के नागपाश से बंध जाने पर गरूड़ को उनके भगवान होने पर शक हुआ। गरूड़ का संदेह दूर करने के लिए देवर्षि नारद ने उन्हें ब्रह्मा जी के पास भेजा। ब्रह्मा जी ने उन्हें भगवान शिव के पास भेजा और भगवान शिव ने उन्हें काकभुशुण्डि के पास भेज दिया। काकभुशुण्डि ने गरूड़ को राम चरित्र की कथा सुनाकर उनका शक दूर किया।

प्राकृतिक सौन्दर्य
काकभुशुण्डि ताल इस झील तक पहुंचने के लिए बड़ी झाड़ियों, नदियों, दर्रों, और फिसलन वाली चट्टानों से गुजरना पड़ता है। यह सबसे मुश्किल और दुर्गम ट्रैक है। इस ताल की यात्रा नीलकंठ, चौखम्बा और नर-नारायण की चोटियों से होकर गुजरती है। कई जगहों पर खड़ी चढ़ाई भी है। मछली के आकार के साथ ही हल्के हरे और नीले पानी से भरा यह ताल अद्भुत है। शांति चाहने वाले लोगों के लिए ये जगह स्वर्ग से कम नहीं है। झील के पास घास के मैदान, नदियां और और जंगल का रास्ता सुकून देता है। काकभुशुण्डि ताल के ऊपर दो विशाल चट्टानें हैं। स्थानीय कथाओं के मुताबिक ये काक (कौवा) और गरुड़ (ईगल) हैं, जो चर्चा कर रहे हैं।

कैसे पहुंच सकते हैं
काकभुशुण्डि ताल पहुंचने के लिए पहले जोशीमठ तक आना पड़ता है। यहां से आगे काकभुशुण्डि तक जाने के दो रास्ते हैं। एक भुइंदर गांव से घांघरिया के पास से जाता है, जबकि दूसरा गोविंद घाट से जाता है।
यहां से नजदीक में जॉली ग्रांट हवाई अड्डा देहरादून में है। इस झील से एयरपोर्ट की दूरी लगभग 132 किलोमीटर है। एयरपोर्ट से झील तक जाने के लिए कार और टैक्सी मिलती है।
झील से नजदीकी रेलवे स्टेशन ऋषिकेश है। यहां से सड़क रास्ते के जरिये जोशीमठ तक पहुंचा जा सकता है।



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