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वाराणसी12 घंटे पहलेलेखक: विकास कुमार

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तस्वीर पिछले साल की है जब मोदी वाराणसी आए थे तो एयरपोर्ट पर दृष्टिबाधित अभय कुमार शर्मा से मिले थे। अभय ने उस समय मोदी की मिमिक्री की थी। अभय इसी स्कूल से पढ़े हैं।

  • देश में सबसे ज्यादा ब्लाइंड स्टूडेंट यूपी में, कहानी उसी ब्लाइंड स्कूल की जहां के बच्चों से मिले थे मोदी
  • यहां लगभग 195 दृष्टि बाधित छात्रों के रहने, खाने और पढ़ने की व्यवस्था है, लेकिन फिलहाल 175 बच्चे रहते और पढ़ते थे

‘जब से पता चला है कि स्कूल ने 9वीं से 12वीं तक के क्लास को बंद करने का फैसला लिया है, तब से मन के भीतर गहरा अंधेरा छा गया है। आंखों के सामने तो पैदाइश के वक्त से ही अंधेरा है। अब तो मन और दिमाग पर भी अंधेरे ने डेरा जमा लिया है। मैं इस साल 11वीं में हूं, पापा नहीं हैं। मैं हूं और मेरी मां है। अब समझ नहीं आ रहा कि कहां जाऊंगा, कैसे पढूंगा और आगे पढ़ भी सकूंगा या नहीं!’

ये उलझन, उदासी और भविष्य के डर में लिपटे शब्द रवि राय के हैं। रवि उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ के रहने वाले हैं। जन्म से देख नहीं सकते और पिता के जाने के बाद अपनी मां के लिए सब कुछ हैं। रवि, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लोकसभा क्षेत्र वाराणसी में दृष्टिबाधित छात्रों के लिए चलाए जा रहे श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार विद्यालय के छात्र हैं। इस स्कूल को चलाने वाले ट्रस्ट ने आर्थिक तंगी का हवाला देते हुए 9वीं, 10वीं, 11वीं और 12वीं की क्लासों को बंद करने का निर्णय लिया है।

स्कूल में प्रेयर करते हुए बच्चे। स्कूल प्रशासन ने 9वीं, 10वीं, 11वीं और 12वीं की क्लास बंद करने का फैसला लिया है।

इस फैसले के बारे में छात्रों को और उनके परिवार को पत्र लिखकर सूचित किया जा रहा है। छात्रों को भेजे गए पत्र में लिखा गया है, ‘आप सभी को यह अवगत कराया जा रहा है कि विद्यालय की कार्यकारिणी समिति की बैठक में यह निर्णय लिया गया है कि आर्थिक तंगी को देखते हुए विद्यालय की कुछ कक्षाओं का संचालन पूरी तरह से बंद किया जाए।’

यही वजह है जिसकी वजह से रवि राय जैसे 48 दृष्टि बाधित छात्र खुद को चौतरफा अंधकार में घिरा पा रहे हैं। स्कूल को संचालित करने वाले श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार स्मृति सेवा ट्रस्ट के वर्तमान अध्यक्ष कृष्ण कुमार जालान की मानें तो कोरोना की वजह से आई आर्थिक मंदी की वजह से ऐसा करना पड़ रहा है।

वे कहते हैं, ‘ट्रस्ट को चलाने वाले ज्यादातर लोग व्यापारी हैं। कोरोना और लॉकडाउन की वजह से सबका व्यापार बैठ गया है। दान सालों-साल कम हो रहा है। सरकार से मिलने वाले सालाना अनुदान के बाद भी हर साल लगभग 40 लाख रुपए ट्रस्ट को लगाना पड़ रहा है। आज की स्थिति में ये भार उठाना मुश्किल हो गया है। पूरे स्कूल को बचाने के लिए ये फैसला लिया गया है।’

तस्वीर 2016 की है। पीएम नरेंद्र मोदी ने इस स्कूल के छात्रों से मुलाकात की थी। मोदी वाराणसी से लोकसभा सांसद हैं।

ट्रस्ट और इस स्कूल का इतिहास

हनुमान प्रसाद पोद्दार स्मृति सेवा ट्रस्ट की स्थापना बनारस में 26 मार्च 1972 को हुई। इस ट्रस्ट के तहत दृष्टिबाधित छात्रों को शिक्षित करने के उद्देश्य से श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार आवासीय अंध विद्यालय की स्थापना हुई।

ये स्कूल बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी से मात्र दो किमी की दूरी पर है। जगह का नाम है दुर्गाकुंड। इस स्कूल को 1984 में जूनियर हाईस्कूल के लिए मान्यता दी गई। वहीं 1993 में इस स्कूल को 12वीं तक पढ़ाई करवाने की अनुमति मिली। तब से इस स्कूल में ब्रेल (LKG के समक्ष) से लेकर 12वीं तक की पढ़ाई हो रही है।

क्लास बंद होने की सूचना के बाद छात्रों के पेरेंट्स ने विद्यालय प्रशासन को पत्र लिखा है। अभिभावकों ने पढ़ाई जारी रखने की मांग की है।

‘स्कूल जल्द बंद हो जाएगा’

यहां करीब 195 दृष्टिबाधित छात्रों के रहने, खाने और पढ़ने की व्यवस्था है, लेकिन फिलहाल 175 बच्चे रहते और पढ़ते थे। कोरोना की वजह से लगे लॉकडाउन के बाद से ही स्कूल बंद है और सारे बच्चे अपने-अपने घरों पर हैं। इस स्कूल को फिलहाल ट्रस्ट और सरकार मिलकर चलाते हैं। एक 18 सदस्यों की कार्यकारिणी समिति है, जिन पर स्कूल के प्रबंधन का जिम्मा है। लगभग सभी व्यापारी हैं।

स्कूल से जुड़े एक बड़े वर्ग को ये भी लगता है कि कार्यकारिणी समिति से जुड़े ज्यादातर लोग व्यापारी हैं। अपना काम-धंधा करते हैं और इस वजह से उनकी रुचि स्कूल को चलाने से ज्यादा बंद करने में है। इसी स्कूल के छात्र रहे और अब बतौर स्टैंड अप कॉमेडियन अपनी पहचान बना चुके अभय कुमार शर्मा को लगता है कि जल्द ही पूरा स्कूल बंद कर दिया जाएगा।

अभय ये भी कहते हैं, ‘इस स्कूल का महत्व केवल वो बच्चे समझ सकते हैं जो अपनी आंखों से दुनिया नहीं देख सकते। अगर ये स्कूल मेरे जीवन में नहीं होता तो आज मैं कहीं किसी चौराहे या रेड लाइट पर बैठा होता, लेकिन ट्रस्ट वालों को तो ज़मीन दिखता है। बड़ी-बड़ी इमारतें दिखती हैं। ये लोग व्यापारी हैं। जैसे एक दुकान से नुकसान हुआ तो उसे बंद कर देते हैं वैसे ही स्कूल के साथ कर रहे हैं। देख लीजिएगा, अगर ये चार क्लासें आज बंद हो गईं तो आने वाले कुछ सालों में पूरा स्कूल ही बंद हो जाएगा।’ अभय कुमार शर्मा पिछले साल तब चर्चा में आए थे जब वो पीएम मोदी से मिले थे और उनके सामने ही उनकी मिमिक्री की थी।

छात्रों ने इस संबंध में यूपी सरकार और केंद्र सरकार को पत्र लिखा है। छात्रों ने ईमेल के माध्यम से अपनी मांग रखी है।

ट्रस्ट की तरफ से मंत्री की सफाई

क्या वाक़ई ट्रस्ट पूरे स्कूल को बंद कर चाहता है? क्या आर्थिक स्थिति एकदम से ख़राब हो गई है या वजह कुछ और है? क्या वाक़ई ट्रस्ट पूरे स्कूल को बंद करने की सोच रहा है?

ट्रस्ट की तरफ से इन सवालों का जवाब देने के लिए मंत्री श्याम सुंदर प्रसाद सामने आए। सबसे पहले आर्थिक मंदी वाले सवाल पर बोलते हुए उन्होंने कहा, ‘स्कूल जब चलता है तो रोज का खर्च होता है। रोज का क्या, हर शाम का खर्च होता है। सरकार से मिलने वाला अनुदान समय पर नहीं मिलता है। अभी ही देख लीजिए कि पिछले तीन साल के अनुदान का पैसा नहीं आया है, लेकिन इस दौरान खर्च तो हुआ।’

वो आगे कहते हैं, “रही बात स्कूल की चार क्लासों को बंद करने फैसले की, तो इसका आर्थिक पक्ष भी है और छात्रों के द्वारा किया जाने वाला व्यवहार भी। इस क्लास के बच्चे बड़े होते हैं। अक्सर ऐसी स्थिति बन जाती है जो ट्रस्ट के लिए शर्मनाक होती है।”

श्याम सुंदर प्रसाद बच्चों के द्वारा किए जाने वाले किस गलत व्यवहार के बारे में बात कर रहे हैं? जो बच्चे देख नहीं सकते वो ऐसा क्या करते हैं जिसकी वजह से ट्रस्ट के सदस्यों के लिए स्थिति शर्मनाक हो जाती है?

पढ़ाई बंद होने की शिकायत को लेकर पीएम मोदी को भी पत्र लिखा गया है। प्रोग्रेसिव फेडरेशन ऑफ विजुअली चैलेज्ड नामक संस्था ने पीएम को पत्र लिखा है।

‘हक की लड़ाई को गलत व्यवहार बताया जा रहा’

शशिभूषण समद इस स्कूल से 2014 में पास हुए। बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी से होते हुए वो फिलहाल दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में मास्टर की पढ़ाई कर रहे हैं। इनकी मानें तो बड़े बच्चे ट्रस्ट से सवाल करते हैं, इसलिए उनकी आंखों में चुभते हैं। वो कहते हैं, ‘आप ऐसे समझिए कि बीएचयू, डीयू या जेएनयू में जिसे अपने हक में लड़ना कहते हैं, आंदोलन कहते हैं, उसे ही ट्रस्ट के लोग ‘गलत व्यवहार’ कह रहे हैं और इसी वजह से शर्मसार हो जाते हैं।’

ट्रस्ट द्वारा आर्थिक मंदी की वजह से क्लास बंद करने के फैसले और छात्रों की आशंका के बारे में जब दैनिक भास्कर ने वाराणसी के डीएम कौशल राज शर्मा से पूछा तो वो बोले, “देखिए, अगर कोई सेवा कम करना चाहता है। बंद करना चाहता है तो हम जबरदस्ती तो नहीं कर सकते। रही सरकार से मिलने वाले मदद की बात तो उसमें एक-दो साल की देरी तो होती ही है। हम ये सुनिश्चित करेंगे कि जिन बच्चों की पढ़ाई बीच में रुक रही है, उन्हें दूसरे इलाकों संचालित होने वाले स्कूलों में दाख़िला मिले। बच्चों का भविष्य खराब नहीं होगा।”

हाईकोर्ट में याचिका भी लगाई गई
ट्रस्ट द्वारा लिए गए इस फैसले को रोकने के लिए कई स्तर पर कोशिशें हो रही हैं। जो कक्षाएं बंद होने वाली हैं, उसमें पढ़ने वाले छात्रों के अभिभावक पत्र लिखकर ट्रस्ट से अपना फैसला बदलने की गुहार लगा रहे हैं। वहीं प्रोग्रेसिव फेडरेशन ऑफ विजुअली चैलेज्ड नामक संस्था ने देश के प्रधानमंत्री और वाराणसी के सांसद नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर इस मामले में हस्तक्षेप की मांग की है। वहीं राष्ट्रीय दृष्टिबाधित संघ के महासचिव, हाईकोर्ट के सीनियर वकील और डेढ़ साल की उम्र में अपनी आंखों की रोशनी पूरी तरह से गंवा चुके संतोष कुमार रूंगटा ने मामले पर इलाहाबाद हाईकोर्ट याचिका लगाई है।

इस स्कूल में यहां लगभग 195 दृष्टिबाधित छात्रों के रहने, खाने और पढ़ने की व्यवस्था है। इस स्कूल को 1984 में जूनियर हाई स्कूल और 1993 में 12वीं तक पढ़ाई की अनुमति मिली।

‘स्कूल को गोदाम बनाना चाहते हैं’

रूंगटा का मानना है कि ट्रस्ट वाले बहाना बना रहे हैं। उनकी नजर जमीन और बिल्डिंग पर है। सब व्यवसायी हैं। चाहते हैं कि बड़े बच्चे चले जाएं तो वो स्कूल के एक हिस्से में अपना गोदाम बना लें। आर्थिक मंदी तो एक बहाना है।

वो कहते हैं, ‘मैं आपके माध्यम से ट्रस्ट को भरोसा दिलाता हूं। वो मेरे सामने पूरा हिसाब-किताब रखें। अगर भारत सरकार से मिलने वाली ग्रांट रुकी हुई है तो मैं उसे दो हफ्तों में दिलवा दूंगा। तब तक वो स्कूल को चलाएं। अगर जरूरत हुई तो हम पैसा देंगे। जिस संसदीय क्षेत्र का प्रतिनिधित्व खुद पीएम मोदी कर रहे हैं, उस इलाके में एक स्कूल आर्थिक तंगी की वजह से अपने चार क्लास बंद कर रहा है। बच्चों को सड़क पर छोड़ दे रहा है तो ये कितना निर्मम और दुखी करने वाला है।’

2001 की जनसंख्या के मुताबिक उत्तर प्रदेश में 18.52 लाख ऐसे लोग हैं, जो देख नहीं सकते हैं। यह संख्या देश में सबसे ज्यादा है। राज्य में दृष्टिबाधित छात्र-छात्रों की ठीक-ठीक संख्या कहीं उपलब्ध नहीं है, लेकिन इस क्षेत्र में काम करने वाले संस्थाओं की माने तो सबसे ज्यादा दृष्टिबाधित छात्र भी उत्तर प्रदेश में ही हैं।

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