नई दिल्ली: आज सबसे पहले आप एक पल के लिए एक ऐसे राज्य या प्रांत की कल्पना कीजिए जो आकार में दुनिया में सबसे बड़ा है. जिसका आकार पाकिस्तान से डेढ़ गुना और बांग्लादेश से 12 गुना ज्यादा है. जहां की कुल आबादी में से 50 प्रतिशत लोग इस्लाम को मानने वाले हैं और जहां की बहुसंख्यक आबादी टर्किश भाषा में बात करती है. एक ऐसा राज्य जिसकी सीमाएं भारत समेत आठ देशों से मिलती हैं और इनमें से 5 देश ऐसे हैं जहां इस्लाम सबसे बड़ा धर्म है. लेकिन बहुसंख्यक मुस्लिम आबादी वाले इस राज्य के मुसलमानों को लंबी दाढ़ी रखने की इजाजत नहीं है. रमजान के महीने में रोजा रखने की इजाजत नहीं है, बच्चे पैदा करने की इजाजत नहीं है, महिलाओं को बुर्का पहनने की इजाजत नहीं है और ये लोग अपनी मर्जी से अपना कोई भी त्योहार नहीं मना सकते. आप हैरान हो रहे होंगे और आपको लग रहा होगा कि जिस राज्य की 50 प्रतिशत आबादी इस्लाम को मानती है वहां मुसलमानों पर इतने सारे प्रतिबंध कैसे हो सकते हैं? अब तक तो वहां विद्रोह हो जाना चाहिए था और दुनिया भर में इस्लाम के रहनुमाओं को इन मुसलमानों को आजाद करा लेना चाहिए था. लेकिन आपको हैरान होने की जरूरत नहीं है. क्योंकि ऐसा ही एक प्रांत भारत के पड़ोसी देश चीन में है. इस प्रांत का नाम है-शिनजियांग.

मस्जिद की जगह शौचालय का निर्माण
शिनजियांग की कुल आबादी में 45 प्रतिशत वीगर मुसलमान हैं, जो मूल रूप से टर्की से संबंध रखते हैं. लेकिन फिर भी यहां के मुसलमान चीन की सरकार की मर्जी के बगैर कुछ नहीं कर सकते. लेकिन चीन की सरकार जब चाहे वीगर मुसलमानों की मस्जिदों को गिरा सकती है और उस जगह पर पब्लिक टॉयलेट यानी सार्वजनिक शौचालय बना सकती है. जब दुनिया कोरोना वायरस से लड़ रही है तब चीन ने अपने देश के मुसलमानों को ही अपना दुश्मन नंबर वन मान लिया है. चीन ने शिनजियांग प्रांत के आर्तुश शहर के एक गांव सुनतगाह में 2 साल पहले एक मस्जिद को गिराया था और अब उस मस्जिद की जगह पर एक पब्लिक टॉयलेट का निर्माण कर दिया गया है.

इस गांव में सभी लोगों के घरों में शौचालय हैं और यहां पर्यटक भी कभी कभार आते हैं. इसलिए स्थानीय लोगों का कहना है कि इस जगह पर पब्लिक टॉयलेट की जरूरत ही नहीं थी और शायद यही वजह है कि चीन ने यहां पब्लिक टॉयलेट तो बना दिया है. लेकिन इसे जनता के लिए नहीं खोला है. इसलिए सवाल यही है कि चीन ने एक मस्जिद की जगह शौचालय का निर्माण क्यों किया? इसका सीधा सा जवाब ये है कि चीन की सरकार के निशाने पर शिनजियांग में रहने वाले मुसलमान हैं और अब तक इस प्रांत की 70 प्रतिशत मस्जिदों को गिराया जा चुका है और एक मस्जिद की जगह पर टॉयलेट बनाकर चीन ने इन मुसलमानों को नीचा दिखाने की कोशिश की है.

इसी प्रांत में पिछले वर्ष चीन की सेना ने 16वीं शताब्दी में बनाई गई एक मस्जिद को गिरा दिया था. इसका नाम था अजना मस्जिद और इस मस्जिद की जगह चीन ने वहां पर शराब और सिगरेट की एक दुकान बना दी. शराब और सिगरेट का इस्तेमाल इस्लाम में प्रतिबंधित है.

इसी तरह चीन के होटान शहर में गिराई गई एक मस्जिद की जगह पर अंडरवियर की एक फैक्ट्री बनाने का प्रयास किया जा रहा है. वीगर ह्यूमन राइट्स प्रोजेक्ट की एक रिपोर्ट के मुताबिक पिछले तीन वर्षों में शिनजियांग में 10 से 15 हजा मस्जिदों को तोड़ा जा चुका है.

मुसलमानों की असली पहचान को समाप्त करना चाहता है चीन
शिनजियांग के रेगिस्तान में मौजूद इमाम असीम दरगाह चीन के मुसलमानों के लिए बहुत पवित्र है. चीन के जो मुसलमान हज के लिए नहीं जा पाते, वो साल में तीन बार इस दरगाह और मस्जिद में आते हैं क्योंकि ये मुसलमान मानते हैं कि तीन बार यहां आना एक बार हज करने के समान है. 2017 तक जो दरगाह पूरी तरह सही सलामत थी, 2019 आते आते उसका ज्यादातर हिस्सा चीन की सरकार द्वारा तोड़ दिया गया और अब यहां बस कुछ गुंबद बचे हैं. 2017 और 2019 में ली गई तस्वीरें इसका प्रमाण हैं. अब यहां कोई नहीं आता और ये मस्जिद भी रेगिस्तान की तरह बंजर हो चुकी है.

चीन इन मस्जिदों को इसलिए गिरा रहा है क्योंकि, वो अपने यहां रहने वाले मुसलमानों की असली पहचान को समाप्त करना चाहता है. चीन में करीब 2 करोड़ 20 लाख मुसलमान रहते हैं और इनमें से एक करोड़ 10 लाख वीगर मुसलमान हैं. चीन इन मुसलमानों को अपने हान समाज का हिस्सा बनाना चाहता है.

चीन की बहुसंख्यक आबादी खुद को हान वंश का मानती है और चीन इन मुसलमानों को भी हान बनाना चाहता है यानी चीन इस्लाम का एक चाइनीज संस्करण तैयार करना चाहता है, जिसमें धर्म की बातों की जगह चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और उनकी कम्युनिस्ट पार्टी के विचार ले लेंगे और इसके लिए चीन शिनजियांग में बड़े पैमाने पर नरसंहार और अत्याचार कर रहा है. चीन में अब तक 18 लाख वीगर मुसलमानों को जेल में डाला जा चुका है, 10 लाख मुसलमानों को एक हजार से ज्यादा कॉन्सेंट्रेशन कैम्प (Focus Camps) में रखा गया है. चीन इन्हें री एजुकेशन ( Re Training Camps ) कहता है. लेकिन सच ये है कि इन कैंपों में मुसलमानों पर तरह तरह के अत्याचार किए जाते हैं. उनका शारीरिक शोषण होता और यहां तक कि मुसलमानों को मारकर उनके अंगों की तस्करी की जाती है.

किसी ने भी खुलकर अब तक चीन के खिलाफ अंगुली नहीं उठाई
इतना ही नहीं, चीन में मुसलमान महिलाओं का रेप किया जाता है तो पुरुषों की जबरदस्ती नसबंदी कराई जाती है और बच्चों को उनके माता पिता से अलग कर दिया जाता है. चीन में रहने वाले मुसलमान इस बारे में ज्यादा कुछ नहीं कर सकते. लेकिन जो लोग और देश चीन में नहीं हैं वो इसके खिलाफ आवाज जरूर उठा सकते हैं. लेकिन कोई ऐसा करता नहीं. खासकर खुद को इस्लाम का रहनुमा मानने वाले देश इस मामले पर बिल्कुल चुप हैं.

उदाहरण के लिए सऊदी अरब खुद को इस्लामिक देशों का नेता मानता है. लेकिन उसने चीन में मुसलमानों पर हो रहे अत्याचारों को लेकर कभी कुछ नहीं कहा.

टर्की जो इस्लामिक दुनिया में सऊदी अरब की जगह लेना चाहता है वो भी इन मुसलमानों के हक में आवाज उठाने की बजाय चीन से भागकर आए मुसलमानों को वापस चीन के हवाले कर देता है.

पाकिस्तान तो ऐसा व्यवहार करता है जैसे उसे पता ही नहीं है कि चीन में मुसलमानों के साथ क्या हो रहा है ?

कश्मीर पर पाकिस्तान के सुर में बात करने वाला मलेशिया कहता है कि वो चीन की आलोचना इसलिए नहीं करता क्योंकि, चीन आलोचनाओं का जवाब देता ही नहीं है.

इसी तरह ईरान चीन से जवाब मांगने की बजाय कहता है कि इन मुसलमानों की आवाज को दबाकर चीन तो इस्लाम की सेवा कर रहा है.

और बाकी की दुनिया का भी यही हाल है. किसी ने भी खुलकर अब तक चीन के खिलाफ उंगली नहीं उठाई है. कुल मिलाकर चीन ने एक मस्जिद की जगह पर एक पब्लिक टॉयलेट बना दिया और दुनिया ने अपनी आंखों पर पट्टी बांध ली.

सऊदी अरब को छोड़ दिया जाए तो ईरान, मलेशिया, पाकिस्तान और टर्की जैसे देश कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाए जाने के मसले पर भारत की आलोचना कर चुके हैं और अलग-अलग तरीकों से ये कह चुके हैं कि भारत कश्मीर में मुसलमानों पर अत्याचार कर रहा है. कश्मीर घाटी की कुल आबादी करीब 55 लाख है इनमें में 97 प्रतिशत मुसलमान हैं यानी इन इस्लामिक देशों को कश्मीर के 52 लाख मुसलमानों की तो चिंता है. लेकिन ये लोग चीन के उन ढाई करोड़ मुसलमानों की बात नहीं करते जिन्हें अपने ही देश में खुलकर सांस लेने की आजादी तक नहीं है.

पूरी दुनिया की 24 प्रतिशत आबादी इस्लाम को मानती हैं और इन लोगों की संख्या 180 करोड़ है इनमें से ज्यादातर उन 50 देशों में रहते हैं जहां इस्लाम सबसे बड़ा धर्म है.

जबकि ईसाई धर्म को मानने वालों की संख्या 250 करोड़ हैं यानी इस्लाम Christianity के बाद दूसरा सबसे बड़ा धर्म है. फिर भी दुनिया के 180 करोड़ मुसलमानों और 50 देश कभी भी चीन को लेकर कुछ नहीं बोलते. इसके पीछे एक बड़ी वजह है जिसके बारे में भी आपको जान लेना चाहिए. इसकी पहली वजह ये है कि ज्यादातर इस्लामिक देश चीन से डरते हैं और दूसरी वजह ये है कि चीन ने इनमें से कई देशों के खरीदकर अपनी जेब में रख लिया है.

चुप्पी की एक बड़ी वजह
चीन ने पाकिस्तान में four लाख 47 हजार करोड़ रुपये का निवेश किया हुआ है. 2017 में चीन ने सऊदी अरब की राजधानी रियाद के साथ 5 लाख 20 हजार करोड़ रुपये की डील साइन की थी. इसी तरह ईरान में चीन 29 लाख करोड़ रुपये का निवेश करने वाला है. मलेशिया के तो कुल विदेशी प्रत्यक्ष निवेश यानी FDI का 45 प्रतिशत हिस्सा चीन से आता है. इतना ही नहीं टर्की की डूबती हुई अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए भी चीन ही आगे रहा है.

खाड़ी के देशों से तेल आयात करने के मामले में चीन पहले नंबर पर है और चीन के खिलाफ इन देशों की चुप्पी की एक बड़ी वजह ये भी है.

दुनिया के जिन देशों ने चीन की वन बेल्ट वन रोड परियोजना का हिस्सा बनने पर सहमति जताई है उनमें से 30 इस्लामिक देश हैं.

लेकिन इन सबसे चीन के अत्याचारों की कहानियों को दबाने का या इसके खिलाफ चुप रहने का हक किसी को नहीं मिल जाता.

90 प्रतिशत आबादी टर्किश मूल की
शिनजियांग प्रांत के एक बड़े हिस्से को वहां के मुसलमान पूर्वी तुर्किस्तान मानते हैं और वर्ष 1949 तक यहां की 90 प्रतिशत आबादी टर्किश मूल की थी और हान वंश के लोगों की संख्या four प्रतिशत से कम हुआ करती थी. लेकिन 70 वर्षों तक चले नरसंहार के बाद अब यहां की आबादी में टर्की से संबंध रखने वाली आबादी सिर्फ 55 प्रतिशत रह गई है और हान चाइनीज लोगों की संख्या बढ़कर 45 प्रतिशत हो चुकी है.

चीन ने शिनजियांग में सिर्फ वीगर मुसलमानों को ही निशाना नहीं बनाया है. बल्कि कजाख, किर्गी और तुर्की मूल के करीब 30 लाख मुसलमान कॉन्सेंट्रेशन कैम्प में रखे गए हैं.

लेकिन चीन के इन अत्याचारों पर वो लोग चुप हैं जो एक जमाने में ये कह रहे थे कि पेरिस के अखबार चार्ली हैब्दो ने पैगंबर मोहम्मद साहब का कार्टून छापकर ठीक नहीं किया और इस अखबार के दफ्तर पर वर्ष 2015 में जो आतंकवादी हमला हुआ था उसके पीछे इस्लाम का अपमान करने पर पैदा हुआ गुस्सा था यानी एक कार्टून के बाद हुई आतंकवादी घटना मुसलमानों के गुस्से के परिणाम होती है. लेकिन एक देश में मुसलमानों पर हो रहे अत्याचारों पर इन्हें गुस्सा नहीं आता.

चीन ने विरोध की ज्यादातर आवाजों को कुचल दिया
चीन कैसे अपने देश के मुसलमानों पर अत्याचार करता है. इसकी कहानी आपको खुद चीन के एक वीगर मुसलमान से सुननी चाहिए. इससे आपको सारी बात समझ आ जाएगी. चीन के शिनजियांग प्रांत के मुसलमान लगातार ये कहते रहे हैं कि वो एक आजाद देश हैं. लेकिन चीन ने उन पर कब्जा किया हुआ है. पूर्व तुर्किस्तान की आजादी को लेकर वहां के लोग पिछले लंबे समय से संघर्ष भी कर रहे हैं. लेकिन पिछले कुछ वर्षों में चीन ने विरोध की ज्यादातर आवाजों को कुचल दिया है. ठीक वैसे ही जैसे चीन ने हांगकांग में लोकतंत्र की आवाज को दबाया, तिब्बत का दमन करके वहां अपना शासन स्थापित किया, फालून गॉन्ग धर्म को मानने वाले लोगों की हत्याएं की, और दक्षिण एशिया के कई देशों पर अतिक्रमण करने की कोशिश की.

लेकिन दुनिया भर के मुसलमानों को तो छोड़िए हमारे देश के भी ज्यादातर मुसलमान चीन के अत्याचारों का विरोध नहीं करते. हमारे देश में कई लोग नागरिकता पर एक नया कानून पास होने पर विरोध प्रदर्शन करने लगते हैं. देश की राजधानी दिल्ली के शाहीन बाग पर कब्जा कर लेते हैं. शहरों को अपना बंधक बना लेते हैं. पैगंबर मोहम्मद साहब को लेकर फेसबुक पर की गई एक टिप्पणी के बाद बेंगलुरू जैसे शहर को जला देते हैं. पुलिस थानों में आग लगा देते हैं. दिल्ली में सरकारी बसों को आग लगा देते हैं और अपने ही देश में आजादी के नारे लगाने लगते हैं. लेकिन इनमें से कोई भी चीन के मुसलमानों की आजादी की बात नहीं करता और इसकी वजह सिर्फ इतनी है कि कई मामलों में चीन ही इन लोगों का वैचारिक पूर्वज है और ये लोग चीन के खिलाफ जाने की हिम्मत नहीं कर सकते हैं. लेकिन हां अपने ही देश को दंगों की आग में जरूर झोंक सकते हैं.

संयुक्त राष्ट्र ने चीन की आलोचना तक नहीं की
वर्ष 2017-2018 में जब म्यांमार से रोहिंग्या मुसलमानों को बाहर निकाला गया और उनके खिलाफ अत्याचार हुए तो पूरी दुनिया में इसकी आलोचना हुई. पूरी दुनिया की बड़ी बड़ी संस्थाओं ने इसे रोहिंग्या मुसलमानों का नरसंहार माना और संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी कहा कि म्यांमार अपने देश में मुसलमानों का सफाया कर रहा है. लेकिन चीन में मुसलमानों पर हो रहे अत्याचारों के विषय पर संयुक्त राष्ट्र ने इसे नरसंहार कहना तो दूर चीन की आलोचना तक नहीं की.

भारत में भी जब रोहिंग्या शरणार्थियों का मुद्दा गर्माया हुआ था और सुप्रीम कोर्ट ने भी कुछ रोहिंग्या मुसलमानों को वापस म्यांमार भेजने का फैसला सुनाया था तो हमारे देश का भी एक वर्ग सक्रिय हो गया था और इस वर्ग ने मानव अधिकारों की आड़ में सुप्रीम कोर्ट तक की आलोचना शुरू कर दी थी. लेकिन चीन में मुसलमानों का जो हाल है, उसे लेकर ये गैंग कभी कुछ नहीं कहता.

ये हाल तब है जब चीन के वीगर मुसलमानों के साथ भारत के ऐतिहासिक व्यापारिक रिश्ते रहे हैं. हजारों वर्ष पहले सिल्क रूट के जरिए भारत और शिनजियांग के इन मुसलमानों के बीच व्यापार होता था.

2006 में जब ईराक के पूर्व राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन को फांसी दी गई थी तब केरल के मुसलमानों और कम्युनिस्ट पार्टी ने सड़कों पर उतरकर इसका विरोध किया था और केरल के कई इलाकों को कुछ घंटों के लिए बंद कर दिया गया था. लेकिन केरल की लेफ्ट पार्टियां चीन में मुसलमानों पर हो रहे अत्याचारों को लेकर कुछ नहीं कहतीं.

इतना ही नहीं केरल के मलप्पुरम जिले के एक गांव का नाम बदलकर सद्दाम हुसैन के नाम पर रख दिया गया था क्योंकि यहां के लोग सद्दाम हुसैन को अपना आदर्श मानते थे. इस जिले की 70 प्रतिशत आबादी इस्लाम को मानने वाली है. ये भारत के उन गिने चुने जिलों में शामिल हैं जहां की बहुसंख्यक आबादी मुसलमान है. लेकिन इस जिले में भी कभी किसी ने चीन के खिलाफ आवाज नहीं उठाई.

सिलसिला आजादी के पहले से ही चलता आ रहा है
लेकिन ये सिलसिला आजादी के पहले से ही चलता आ रहा है. 1919 से 1924 के दौरान भारत में खिलाफत आंदोलन चलाया गया था. ये आंदोलन देश के मुसलमानों ने ओट्टोमन साम्राज्य (Ottoman Empire) और उसके खलीफा के पक्ष में चलाया था क्योंकि उस जमाने में ओट्टोमन साम्राज्य के खलीफा को सुन्नी मुसलमानों का सबसे बड़ा नेता माना जाता था. प्रथम विश्व युद्ध के बाद पश्चिम के देशों के द्वारा ओट्टोमन साम्राज्य पर कई प्रतिबंध लगा दिए गए थे और टर्की से 5 हजार किलोमीटर दूर इसी का विरोध हो रहा था. इस आंदोलन में कांग्रेस पार्टी और महात्मा गांधी जैसे नेता भी शामिल थे. लेकिन मजे की बात ये है कि इस आंदोलन का भारत की आजादी से कोई लेना देना नहीं था. फिर भी राजनेता हिंदू मुस्लिम एकता के नाम पर 5 हजार किलोमीटर दूर मौजूद एक देश को अपना समर्थन देते रहे.

लेकिन उसी कांग्रेस पार्टी के उत्तराधिकारी कभी चीन के मुसलमानों की स्थिति पर चिंता नहीं जताते. ये लोग चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के साथ समझौता तो कर लेते हैं. लेकिन चीन को ये समझाने में इन्हें बहुत डर लगता है कि चीन अपने करोड़ों मुसलमानों के साथ ठीक नहीं कर रहा. इसलिए आज हमने आपको चीन के ढाई करोड़ मुसलमानों की वो चीखें सुनाईं हैं जिन्हें लेकर दुनिया के 180 करोड़ मुसलमान और उनके रहनुमा खामोश बैठे हैं और चीन का विरोध करने से बच रहे हैं.

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