नई दिल्ली: आज हम दुनिया के 395 करोड़ पुरुषों को समर्पित एक विश्लेषण कर रहे हैं. कल 19 नवंबर को अंतरराष्ट्रीय पुरुष दिवस यानी Worldwide Males’s Day मनाया गया. इस दिन को मनाए जाने का मकसद होता है. उन आदर्श पुरुषों को प्रोत्साहन देना जो समाज की भलाई में योगदान देते हैं. 

इस दिन पुरुषों के स्वास्थ्य को लेकर भी जागरूकता पैदा की जाती है और पुरुषों के साथ होने वाले भेदभाव पर भी चर्चाएं होती हैं. लेकिन हमें यकीन है कि आप में से ज्यादातर लोगों को ये पता ही नहीं होगा कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऐसा कोई दिन भी मनाया जाता है जो पुरुषों को समर्पित होता है. लेकिन इस दिन को मनाया जाना इसलिए जरूरी है क्योंकि, दुनिया भर में आत्महत्या करने वालों में 76 प्रतिशत पुरुष होते हैं. बेघर लोगों में पुरुषों की हिस्सेदारी 85 प्रतिशत है.

दुनिया में घरेलू हिंसा का शिकार होने वाले 40 प्रतिशत पुरुष
दुनिया में कुल जितने लोगों की हत्या होती है, उनमें 70 प्रतिशत पुरुष होते हैं. पूरी दुनिया में घरेलू हिंसा का शिकार होने वाले पुरुषों का प्रतिशत 40 है. पुरुषों को मिलने वाली जेल की सजा की अवधि भी महिलाओं के मुकाबले 64 प्रतिशत ज्यादा होती है. काम के दौरान यानी व​​र्क प्लेस में होने वाली मृत्यु में पुरुषों की हिस्सेदारी 92 प्रतिशत है. अगर महिला और पुरुष एक ही अपराध करें तो उसके लिए पुरुषों के जेल जाने की संभावना महिलाओं के मुकाबले तीन से चार गुना ज्यादा होती हैं.

पुरुषों के इर्द-गिर्द एक झूठ का घेरा 
इन सब समस्याओं के बावजूद पुरुषों के इर्द-गिर्द एक ऐसा झूठ का घेरा बना दिया जाता है जिसमें उन्हें जीवन भर रहना पड़ता है. ये झूठ का घेरा जिन विचारों और शब्दों से तैयार होता है उनमें से कुछ हैं, मर्द को दर्द नहीं होता, लड़के रोते नहीं हैं, पुरुषों को डिप्रेशन नहीं होता, डिप्रेशन में जाने वाले पुरुष कमजोर होते हैं, एक ड्रिंक पी लो सब ठीक हो जाएगा, फलां चीज़ के बारे में बात ही मत करो और मर्द बनो, लड़कियां टफ लड़कों को पसंद करती हैं. ये पुरुषों से कहे जाने वाले वो शब्द हैं जो उनके असली व्यक्तित्व को कभी उभरने ही नहीं देते हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं कि असल में पुरुषों के इर्द गिर्द जो घेरा बनाया जाना चाहिए उसमें कौन से शब्द और विचार होने चाहिए ? 

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उसमें पुरुषों से कहा जाना चाहिए कि रोने में कुछ गलत नहीं है यानी Its Okay To Cry, तुम्हें हमेशा मजबूत बने रहने की जरूरत नहीं है, खुद को साबित करते रहना ही तुम्हारा लक्ष्य नहीं होना चाहिए, मदद मांगना कमजोरी की निशानी नहीं है, तुम्हें अकेले बोझ उठाने की जरूरत नहीं है और भावनाओं को व्यक्त करने का तुम्हारा भी उतना ही अधिकार है जितना किसी महिला का है.

ज्यादातर मौकों पर संघर्षों के बदले सम्मान नहीं मिलता
लेकिन इन बातों को समझने के लिए हमें सबसे पहले उन भूमिकाओं को समझना होगा जिन्हें निभाते-निभाते पुरुषों की पूरी जिंदगी निकल जाती है लेकिन ज्यादातर मौकों पर उन्हें अपने कठिन परिश्रम और संघर्षों के बदले में वो सम्मान नहीं मिलता जिसके वो हकदार हैं.

पुरुष का सफर एक छोटे बच्चे के रूप में शुरू होता है और कई बार यहीं से उसे कठोर और संवेदनहीन बनाने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है. पुरुषों को बचपन से ही सिखाया जाता है कि लड़के रोते नहीं हैं. आंसू न बहाने की ये सीख एक पुरुष के साथ जीवन भर चलती रहती है और अपना दर्द छिपाने की यही आदत कई बार तनाव और डिप्रेशन में बदल जाती है.

हॉलैंड में हुई एक रिसर्च के मुताबिक एक महिला एक वर्ष में 30 से 64 बार रोती हैं जबकि पुरुष सिर्फ 6 से 17 बार आंसू बहाते हैं.

न्यूरो साइंस के मुताबिक आंसू शरीर से विषाक्त पदार्थ बाहर निकालने का काम करते हैं. यानी जो आंसू जहर को शरीर से बाहर निकालते हैं, उन्हें पुरुषों के लिए बचपन से ही प्रतिबंधित कर दिया जाता है और ये भावनात्मक जहर धीरे-धीरे एक पुरुष के पूरे व्यक्तित्व को नकारात्मक बना देता है.

इसके बाद जब कोई पुरुष युवा अवस्था में आता है तो अक्सर उसकी तुलना दूसरों से की जाती है. दूसरों की तरक्की के आधार पर उसका मानसिक, शारीरिक, शैक्षणिक और आर्थिक आकलन होता है. Indian Journal Of Group Medication के मुताबिक 21 से 49 वर्ष के 53 प्रतिशत पुरुषों के साथ सिर्फ इसलिए हिंसा होती है क्योंकि, वो पुरुष हैं

लेकिन एक पुरुष का संघर्ष यहीं खत्म नहीं होता. विवाह हो जाने के बाद भी उसे घर की अर्थव्यवस्था संभालनी होती है और पूरे परिवार का पालन-पोषण करना होता है. इस बीच नौकरी चले जाने का डर भी पुरुषों को लगातार सताता रहता है. भारतीय समाज में भी पैसे कमाने की जिम्मेदारी ज्यादातर पुरुषों को ही दी जाती है. नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के मुताबिक आत्महत्या करने वाले 7 प्रतिशत पुरुष बेरोजगारी और पैसों की कमी की वजह से आत्महत्या करते हैं.

ये मत कहिए कि लड़के रोते नहीं हैं…
इसके बाद जब कोई पुरुष वृद्ध अवस्था में प्रवेश करता है तो भी उसे तमाम परेशानियों का सामना करना पड़ता है. भारत में करीब एक करोड़ 80 लाख बुज़ुर्ग बेघर हैं और इनमें पुरुषों की संख्या ज्यादा है. बहुत सारे वृद्ध पुरुषों को उनकी अपनी संतान ही घर से बाहर निकाल देती है. यानी जिन बच्चों को एक पिता, एक पेड़ की तरह अपनी छांव में बड़ा करता है. वो बच्चे ही एक दिन उसे ठोकर मार देते हैं. यानी बचपन से लेकर बुढ़ापे तक पुरुष परेशानियों और संघर्ष का सामना करते हैं. लेकिन फिर भी हम बार बार कहते हैं कि मर्द को दर्द नहीं होता । जबकि सच ये है कि एक मर्द को दर्द भी होता है. दुख भी होता है. लेकिन वो अपने दुखों का प्रदर्शन नहीं करता और जो मर्द ऐसा करते हैं, उन्हें कमजोर मान लिया जाता है. इसलिए अगली बार जब कोई पुरुष आपके सामने दुख का इजहार करे तो ये मत कहिए कि लड़के रोते नहीं हैं, बल्कि ये कहिए अगर आप इंसान हैं तो कभी कभी खुलकर रो सकते हैं और इसमें किसी को शर्म नहीं आनी चाहिए.

एक पुरुष हर स्थिति में अपने परिवार को सभी सुख सुविधाएं उपलब्ध कराता है फिर चाहे इसके लिए उसकी तारीफ हो या न हो उसे सम्मान मिले या न मिले उसे प्यार मिले या न मिले. पुरुषों पर सख्त और संवेदनहीन होने का आरोप लगता है. लेकिन पुरुष युवा अवस्था से लेकर बुढ़ापे तक जिन पड़ावों से होकर गुजरते हैं, उन्हें अगर आप समझ जाएंगे तो आप पुरुषों को भी सही तरीके से समझने लगेंगे. क्योंकि, पुरुष होना आसान नहीं है. आज हम पुरुषों के जीवन के उन 6 चैप्टर्स को आपके सामने रखना चाहते हैं जिन चैप्टर्स में हर पुरुष की कहानी छिपी है.

पुरुषों को उन्हें मिलने वाले नंबरों के आधार पर आंका जाता है
पुरुषों को उन्हें मिलने वाले नंबरों के आधार पर आंका जाता है, उनके प्रयासों को कोई नहीं देखता इसके बाद पुरुष पारिवारिक जिम्मेदारियां निभाने कि लिए अपने सपने भूलने पर मजबूर हो जाते हैं. पुरुषों से उम्मीद की जाती है कि वो खुद को एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी साबित करें, जबकि ऑर्डिनरी यानी सामान्य होने में कुछ भी गलत नहीं है. पुरुषों के व्यक्तित्व का निर्माण कुछ इस तरीके से होता है कि वो अपने माता पिता तक को गले लगाने से हिचकते हैं. एक पुरुष अपने बच्चों से प्यार तो बहुत करता है लेकिन वो इसका इजहार नहीं कर पाता और जब पुरुष रोना चाहते हैं तो उनसे कह दिया जाता है कि मर्द रोते नहीं हैं.

लेकिन सच ये है कि बहुत सारे पुरुष दिल खोलकर रोना चाहते हैं और जब वो ऐसा नहीं कर पाते तो वो अक्सर मानसिक परेशानियों का शिकार हो जाते हैं. भारत में करीब 15 प्रतिशत पुरुषों को कोई न कोई मानसिक समस्या है और ये मानसिक समस्याएं कई बार आत्महत्या की वजह भी बन जाती हैं. लेकिन कुल मिलाकर पुरुषों की समस्याओं को सिर्फ आंकड़ों की शक्ल में देखना भी ठीक नहीं है. आंकड़े आपको समस्या के बारे में बताते हैं लेकिन वो कई बार आपको इसकी वजह और इसका समाधान नहीं बता पाते.

कहीं सच में सुशांत डिप्रेशन में तो नहीं थे?
उदाहरण के लिए जब सुशांत सिंह राजपूत जैसे अभिनेता की मौत होती है तो उस पर तमाम बातें तो होती हैं, न्यूज़ चैनलों पर डिबेट भी होती है, हंगामा भी मचता है और उनकी मौत को राष्ट्रीय मुद्दा भी बना दिया जाता है. लेकिन कोई इसके पीछे की वजह जानने की कोशिश नहीं करता और कोई इस पर तो बिल्कुल भी बात नहीं करता कि कहीं सच में सुशांत डिप्रेशन में तो नहीं थे? उन्हें किसी चीज की कमी तो नहीं खल रही थी? जिस व्यक्ति के पास सब कुछ था, जो सफल भी था, उसने भला मौत का रास्ता क्यों चुना? आज Internatinal Males’s Day पर सुशांत सिंह की बात करना इसलिए जरूरी है क्योंकि, उनकी मौत कैसे हुई ये अभी तक साफ नहीं है. उन्होंने हत्या की या उन्हें मार दिया गया ये भी अभी तक पता नहीं चल पाया है. सुशांत की मौत का मुद्दा TRP का विषय नहीं है और उनका ये मुद्दा अभी मरा नहीं है. लेकिन फिर भी सुशांत पर अब सब लोग शायद इसलिए शांत हो गए हैं क्योंकि, हम पुरुषों के संदर्भ में वास्तविकता को शायद देखना ही नहीं चाहते. इसे आपको एक छोटे से उदाहरण से समझना चाहिए. सुशांत सिंह राजपूत अक्सर एक काले रंग की टी शर्ट पहना करते थे जिस पर लिखा होता था Schrodinger’s Smiley. इस टी शर्ट पर Schrodinger शब्द के साथ साथ एक Smiley बना हुआ है, जो खुश भी है और दुखी भी. यानी ये Smiley एक साथ Glad भी है और Unhappy भी है.

सुशांत बहुत पढ़े लिखे थे और उन्हें विज्ञान में बहुत रुचि थी और वो अक्सर ऐसी चीजों के बारे में पढ़ते लिखते थे. जिनके बारे में बहुत सारे लोगों को कुछ पता नहीं होता और Schrodinger’s Smiley भी ऐसी ही चीजों में से एक है.

एक काल्पनिक प्रयोग
Erwin Schrodinger ऑस्ट्रिया के एक Quantum Physicist थे. उन्होंने एक काल्पनिक प्रयोग किया था, यानी इस प्रयोग की सिर्फ कल्पना की गई थी और इसे हकी​कत में अंजाम नहीं दिया गया. इस काल्पनिक प्रयोग में एक बक्से में एक बिल्ली को बंद किया जाता है और उस बक्से में एक रेडियो एक्टिव बम लगा दिया जाता है. जो कुछ समय बाद फट जाएगा और बिल्ली की मौत हो जाएगी. अब Quantum Physics के मुताबिक सभी वास्तविकताएं उसे देखने वाले पर निर्भर करती हैं. इसलिए जब तक कोई उस बक्से को खोलकर देख नहीं लेता तब तक आप मान सकते हैं कि बम फट गया या आप ये भी मान सकते हैं कि बम नहीं फटा है, आप मान सकते हैं कि बिल्ली मर गई है और आप ये भी मान सकते हैं कि बिल्ली जिंदा है. यानी सारी संभावनाएं उस बक्से में एक साथ बंद है और जैसे ही कोई उस बक्से को खोलकर देखेगा, उनमें से एक संभावना सच हो जाएगी. यानी उस बक्से को खोलने के बाद ही बिल्ली की किस्मत का फैसला होगा. इसे Schrodinger’s Cat Experiment कहा जाता है. और इसी प्रयोग के आधार पर किसी ने Schrodinger’s Smiley नाम से टी शर्ट बना दी. इसी तरह ज्यादातर पुरुष भी मनोवैज्ञानिक रूप से एक बक्से में बंद हैं जहां वो शायद खुश भी हैं और शायद दुखी भी. सच्चाई क्या है इसका पता तभी चल सकता है जब आपका कोई अपना उस बक्से को खोलकर देखेगा.

इसलिए अगर आपके आस पास भी कोई पुरुष अकेलेपन के बक्से में बंद है. तो ये आपका कर्तव्य बनता है कि आप उस बक्से को खोलें और उस पुरुष की स्थिति क्या है इसे समझने की कोशिश करें.

19 नवंबर को  Worldwide Philosophy day भी मनाया जाता है इसलिए आज आपको पुरुषों के संदर्भ में एक बात Philosophy के नजरिए से भी समझ लेनी चाहिए.

पुराणों में ईश्वर के अर्ध-नारीश्वर रूप की पूजा
कहा जाता है कि हर पुरुष के अंदर एक नारी के भी गुण होते हैं. इसलिए हमारे पुराणों में ईश्वर के अर्ध-नारीश्वर रूप की भी पूजा होती है. एक आदर्श पुरुष वो होता है, जिसके अंदर दया और करुणा की भावना होती है. हमारा समाज पुरुषों के आंसू को उनकी कमजोरी मानता है, लेकिन ऐसी सोच गलत है. एक पुरुष के विचारों में भावुकता होना कहीं से गलत नहीं है. उसके स्वभाव में कठोरता या दृढ़ता होना भी गलत नहीं है. लेकिन एक आदर्श पुरुष के अंदर महिलाओं के प्रति सम्मान का भाव जरूर होना चाहिए इस बात का हमेशा ध्यान रखिए.

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