नई दिल्ली : आपको याद होगा जब इस साल फरवरी में देश की राजधानी दिल्ली में दंगे हो रहे थे तब अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भारत की यात्रा पर थे. तब हमारे देश में बैठे टुकड़े-टुकड़े गैंग, डिजाइनर पत्रकारों और बुद्धिजीवियों ने पूरा जोर लगा दिया था कि वह ट्रंप के मुंह से भारत की आलोचना करवा लें या कम से कम ट्रंप इतना तो कह दें कि वह भारत की स्थिति को लेकर बहुत चिंतित हैं. लेकिन ट्रंप ने इनकी उम्मीदों पर पानी फेर दिया और उन्होंने इस मुद्दे पर कुछ नहीं कहा. इसीलिए हम ऐसे लोगों को पत्रकारिता के गिद्ध कहते हैं. इन लोगों की सारी कोशिश सिर्फ यह होती है कि किसी तरह से देश को बदनाम किया जा सके, यह लोग भारत की अंतर्राष्ट्रीय आलोचना पर जश्न मनाते हैं, तालियां बजाते हैं.

अब जब अमेरिका में दंगे हो रहे हैं तो यह लोग बिल्कुल चुप हैं. 25 मई को अमेरिका में एक अश्वेत नागरिक की पुलिस द्वारा गला घोंटकर हत्या कर दी गई थी. इस अश्वेत अमेरिकी का नाम है जॉर्ज फ्लायड (George Floyd), लेकिन इस हत्या के बाद इन लोगों की जुबान से एक शब्द तक नहीं निकला. इस घटना में इन लोगों को मानवाधिकारों का उल्लंघन नजर नहीं आता, अमेरिका के अल्पसंख्यकों की चिंता नहीं सताती. यह लोग अमेरिका में हो रहे दंगों को आधार बनाकर देश के मुसलमानों और दलितों को भड़का रहे हैं और कह रहे हैं कि भारत में भी ऐसे ही हिंसक प्रदर्शन होने चाहिए. 

अमेरिका में ये दंगे पुलिस के हाथों एक अश्वेत नागरिक की हत्या के बाद से हो रहे हैं. हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि दुनिया के सबसे शक्तिशाली व्यक्ति और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को व्हाइट हाउस  में बने एक बंकर में शरण लेनी पड़ी. इस बंकर का इस्तेमाल आतंकवादी घटनाओं के दौरान किया जाता है. दंगाई और प्रदर्शनकारी अमेरिका की राजधानी वाशिंगटन डीसी तक पहुंच चुके हैं और इसी वजह से शनिवार रात व्हाइट हाउस  के बाहर लगी सभी लाइट भी बंद करनी पड़ीं. 
शनिवार रात प्रदर्शनकारी व्हाइट हाउस तक पहुंच गए और व्हाइट हाउस के पास आगजनी की कई घटनाएं भी हुईं. इन प्रदर्शनों की वजह से व्हाइट हाउस की बाहरी लाइटों को बंद कर दिया गया और व्हाइट हाउस पूरी तरह से अंधेरे में डूब गया.

25 मई को अमेरिका के मिनेपोलिस ( Minneapolis) शहर में 46 साल के अश्वेत अमेरिकी जॉर्ज फ्लायड को पुलिस ने गिरफ्तार किया था. जॉर्ज फ्लायड पर 20 डॉलर का नकली नोट देकर सिगरेट खरीदने का आरोप था. मौके पर पहुंची पुलिस ने जॉर्ज फ्लायड को गिरफ्तार कर लिया और उसे भागने से रोकने के लिए एक पुलिस वाले ने उसकी गर्दन पर अपना घुटना रख दिया. कहा जा रहा है कि आरोपी पुलिस कर्मी ने जॉर्ज फ्लायड की गर्दन को eight मिनट 46 सेकेंड  तक अपने घुटने के नीचे दबाए रखा, जिसकी वजह से जॉर्ज का दम घुट गया और उसकी मौत हो गई. इसी के बाद से मिनेपोलिस समेत अमेरिका के तमाम शहरों में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए और इन विरोध प्रदर्शनों ने कई जगह लूटपाट और आगजनी का रूप ले लिया. अब अमेरिका के किसी शहर में शोरूम लूटे जा रहे हैं, कहीं सुपर स्टोर लूटे जा रहे हैं तो कहीं लोगों ने ज्वेलरी की दुकानों को भी लूटना शुरू कर दिया है.

अमेरिका का शहर मिनेपोलिस अमेरिका के मिनेसोटा राज्य में आता है और अब हालात को काबू में करने के लिए मिनेसोटा में नेशनल गार्ड को उतार दिया गया है. नेशनल गार्ड अमेरिकी सेना का अंग है और दूसरे विश्वयुद्ध के बाद पहली बार मिनेसोटा राज्य में दंगों को काबू करने के लिए सेना की मदद ली जा रही है. इसके अलावा अमेरिका के कम से कम सात राज्य ऐसे हैं, जहां नेशनल गार्ड को बुलाने की तैयारी कर ली गई है. इस दौरान कुछ प्रदर्शनकारी हिंसा का सहारा ले रहे हैं और जबकि कुछ लोग शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रह हैं. ये लोग ब्लैक लाइफ मैटर्स (Black Life Issues) और आई कैन ब्रीथ ( I Cant Breath) जैसे नारे लगा रहे हैं. लेकिन अमेरिका में हालात नियंत्रण से बाहर कैसे हुए और एक अश्वेत नागरिक की हत्या ने कैसे अमेरिका के इतने शहरों को दंगों की आग में झोंक दिया, यह समझने के लिए आपको अमेरिका के इतिहास और उसकी जनसंख्या को समझना होगा.

अमेरिका में आज जिन्हें श्वेत या व्हाइट अमेरिकन कहा जाता है, वह अमेरिका के मूल निवासी नहीं हैं. अमेरिका के मूल निवासियों को अमेरिकन इंडियंस या रेड इंडियंस कहा जाता है. 15वीं शताब्दी में जब इटली के खोजकर्ता क्रिस्टोफर कोलंबस भारत की तलाश में निकले और गलती से अमेरिका पहुंच गए, तब गलतफहमी की वजह से उन्होंने वहां के मूल निवासियों को इंडियंस कहा और जब बाद में भारत की खोज हुई तो त्वचा के रंग में अंतर की वजह से अमेरिका के मूल निवासियों को रेड इंडियंस कहा जाने लगा. हालांकि अब इनके लिए नेटिव अमेरिकन या इंडियन अमेरिकन शब्द का इस्तेमाल होता है.

आज अमेरिका में जो श्वेत नागरिक हैं, उनमें से ज्यादातर के पूर्वज यूरोप, मिडल ईस्ट और उत्तरी अफ्रीका जैसे इलाकों से आए थे. लेकिन आज अमेरिका की जनसंख्या में इनकी हिस्सेदारी करीब 75 प्रतिशत है, जबकि अमेरिका की जनसंख्या में मूल निवासियों की हिस्सेदारी 2 प्रतिशत से भी कम रह गई है.

अमेरिका में रहने वाले श्वेत अमेरिकियों में से 17 प्रतिशत के पूर्वज जर्मन मूल के थे , जबकि 12 प्रतिशत आइरिश, 9 प्रतिशत इंग्लिश,  6 प्रतिशत इटैलियन, four प्रतिशत फ्रेंच, और three प्रतिशत श्वेत अमेरिकियों के पूर्वज पोलिश मूल के हैं. इसके अलावा अमेरिका में करीब 12 प्रतिशत अफ्रीकी अमेरिकन्स रहते हैं और इन्हें ही अमेरिका में अश्वेत या Black कहा जाता है. जबकि अमेरिका में एशियाई मूल के नागरिकों की संख्या करीब 5.6 प्रतिशत है.

यानी कुल मिलाकर अमेरिका को बाहर से आने वाले लोगों ने बसाया है और इसीलिए अमेरिका को प्रवासियों का देश या Nation of Immigrants भी कहते हैं. अमेरिका अलग-अलग संस्कृतियों का केंद्र रहा है, लेकिन आज अमेरिका अपनी यह चमक खोता जा रहा है और अमेरिका में हो रहे प्रदर्शन और दंगे भी इसी की सूचना देते हैं. अमेरिका में रंगभेद का इतिहास बहुत पुराना है. वर्ष 1619 में पहली बार अमेरिका में अफ्रीकी मूल के लोगों को गुलाम बनाकर लाया गया था और आज से 152 साल पहले यानी 1868 में पहली बार इन अश्वेतों को अमेरिका में नागरिकों का दर्जा मिला था. लेकिन 400 वर्षों के बाद भी अमेरिका में ज्यादा कुछ नहीं बदला है. गुलामी की प्रथा समाप्त जरूर हो गई है, लेकिन रंगभेद आज भी अमेरिकी समाज का हिस्सा है.

अमेरिका में बड़े पैमाने पर हो रहे दंगे और प्रदर्शन यही बताते हैं कि अमेरिका में आज भी अश्वेतों को वह न्याय और वह जगह नहीं मिली है जिसकी वो मांग करते आए हैं. इसी वजह से अमेरिका में 50 और 60 के दशक में बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुए और मार्टिन लूथर किंग जूनियर इन आंदोलनों का बड़ा चेहरा बन गए. मार्टिन लूथर किंग जूनियर, महात्मा गांधी को अपना आदर्श मानते और कहते थे कि आंदोलनों में हिंसा की कोई जगह नहीं है. लेकिन एक बार अपने एक मशहूर भाषण में उन्होंने यह भी कहा था कि दंगे वह लोग करते हैं जिनकी आवाज कहीं नहीं सुनी जाती. 

अमेरिका में बन रहे ताजा हालात को देखते हुए बहुत सारे लोग कह रहे हैं कि अमेरिका एक बार फिर 60 के दशक में जा रहा है. ऐसा नहीं है कि अमेरिका में अश्वेत नागरिकों को तरक्की के अवसर नहीं मिले. लेकिन अमेरिका में रंगभेद की जड़ें इतनी मजबूत हैं कि वहां के ज्यादातर अश्वेत नागरिक आज भी अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे हैं. लेकिन अमेरिका में पिछले 6 दिनों से जो कुछ हो रहा है उसकी कुछ अहम वजहों के बारे में आपको जान लेना चाहिए.

पहली वजह है अमेरिका की न्याय व्यवस्था जिस पर अश्वेतों के साथ भेदभाव करने का आरोप लगता है. उदाहरण के लिए वर्ष 2015-16 में अमेरिका में स्कूल जाने वाले बर्च्चों में अश्वेतों की हिस्सेदारी सिर्फ 15 प्रतिशत थी. लेकिन स्कूल से निलंबित यानी सस्पेंड किए जाने वाले छात्रों में इनकी हिस्सेदारी 35 प्रतिशत और हमेशा के लिए स्कूल से निकाल दिए जाने वाले छात्रों में इनकी हिस्सेदारी 36 प्रतिशत थी. New York Civil Liberties Union की एक रिपोर्ट के मुताबिक न्यूयॉर्क में ट्रैफिक पुलिस द्वारा रोके गए लोगों में से 88 प्रतिशत या तो अश्वेत थे या फिर लैटिन मूल के थे. और इनमें से 70 प्रतिशत की तो कोई गलती भी नहीं थी.
अमेरिकी राज्य नॉर्थ कैरोलिनैक में 1980 से लेकर 2007 तक सामने आए हत्या के मामलों पर एक अध्ययन किया गया. इस अध्ययन में ये सामने आया कि अगर किसी श्वेत अमेरिकी यानी व्हाइट अमेरिकन की हत्या हो जाती है तो हत्या करने वाले को मौत की सजा मिलने की संभावना तीन गुना ज्यादा होती है.

एक स्टडी के मुताबिक किसी श्वेत नागरिक को नौकरी या इंटरव्यू के लिए कॉल आने की संभावना किसी अश्वेत नागरिक के मुकाबले 50 प्रतिशत ज्यादा होती है, क्योंकि कंपनियां रेज्यूमे पर लिखा नाम देखकर कैंडिडेट के रंग का अंदाजा लगा लेती हैं. अमेरिका में अश्वेतों और एशियाई मूल के लोगों के साथ होने वाले भेदभाव की लिस्ट बहुत लंबी है और ये सारे आंकड़े साफ करते हैं कि अमेरिका की कथनी और करनी में कितना अंतर है. लेकिन अमेरिका में हो रहे इन विरोध प्रदर्शनों की एक दूसरी वजह भी है और वो है ये है कि अमेरिका में पुलिस को शक के आधार पर कार्रवाई करने के लिए तो बहुत सारे अधिकार और हथियार सौंपे गए हैं. लेकिन आरोपी के पास बचाव के ज्यादा मौके नहीं होते. अमेरिका में पुलिस सुधार ना होने से भी लोगों में काफी गुस्सा है. 

इन आंदोलनों की तीसरी बड़ी वजह है अमेरिका में बढ़ती बेरोजगारी. कोरोना वायरस की वजह से अमेरिका में करीब four करोड़ लोग बेरोजगार हो चुके हैं और नौकरियां ना होने की वजह से लूटमार जैसी घटनाएं बढ़ रही हैं. और चौथी वजह है अमेरिका में विपक्ष का अभाव. अमेरिका की राजनीति भारत से बहुत अलग है. वहां पार्टियां आपस में राष्ट्रीय मुद्दों पर उतनी बहस नहीं करतीं, जितनी स्थानीय मुद्दों पर करती हैं. अमेरिका में आप बहुत कम मौकों पर विपक्ष के किसी नेता को राष्ट्रीय मुद्दों पर बात करते हुए सुनेंगे. अमेरिका में इन मुद्दों पर बहस ज्यादातर टीवी डिबेट के दौरान ही होती है और उसमें भी ज्यादातर नेताओं की जगह आलोचक हिस्सा लेते हैं. अगर अमेरिका के कुछ बड़े विपक्षी नेता इन मुद्दों पर कुछ बोलते भी हैं तो अक्सर उनकी भाषा जोड़ने वाली नहीं बल्कि तोड़ने वाली होती है.

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