नई दिल्ली: अगर आपसे पूछा जाए कि आजादी के बाद से भारत ने अब तक कितने युद्ध लड़े हैं तो शायद आप में से ज्यादातर लोगों का जवाब होगा चीन के साथ वर्ष 1962 का युद्ध, पाकिस्तान के साथ 1965 का युद्ध, 1971 का युद्ध और पाकिस्तान के साथ 1999 का कारगिल युद्ध. लेकिन सच ये है कि भारत ने अपना पहला युद्ध आजादी के सिर्फ 2 महीनों के बाद लड़ा था. वर्ष 1947 में 22 अक्टूबर के दिन लड़े गए इस युद्ध ने भारत के भविष्य को पूरी तरह से बदलकर रख दिया था. लेकिन इतिहास के पन्नों में इस युद्ध को वो जगह नहीं मिली जो मिलनी चाहिए थी, भारत के दरबारी इतिहासकारों ने तो इसे युद्ध तक मानने से इनकार कर दिया और इसका फायदा पाकिस्तान ने उठाया. इसलिए हम आजाद भारत के पहले युद्ध के बारे में आपको बताएंगे और ये भी बताएंगे कि किस सोची समझी साजिश के तहत इतने बड़े युद्ध को सिर्फ कबाइलियों का हमला बताकर भुला दिया गया.

पाकिस्तान को रास नहीं आई भारत की धर्म निरपेक्षता
ये बात 15 अगस्त 1947 की है. ये वो तारीख है जिस दिन भारत अंग्रेजों की गुलामी से आजाद हुआ था. लेकिन इस आजादी की कीमत भारत ने अपने बंटवारे के साथ चुकाई थी. भारत के दो टुकड़े होने के बाद बहुसंख्यक मुसलमानों को उनका देश पाकिस्तान मिल चुका था और भारत एक धर्म निरपेक्ष देश के साथ दुनिया के सामने आया. भारत की धर्म निरपेक्षता का सबसे बड़ा उदाहरण था उस समय का जम्मू और कश्मीर, जिसकी बहुसंख्यक आबादी इस्लाम को मानने वाली थी, जबकि कश्मीर के राजा हरि सिंह एक हिंदू थे. लेकिन पाकिस्तान को भारत की ये धर्म निरपेक्षता रास नहीं आई और वो हर कीमत पर कश्मीर को हासिल करना चाहता था, इसका नतीजा ये हुआ कि 15 अगस्त 1947 को जब भारत के तत्कालीन नेता आजादी का जश्न मना रहे थे उस समय पाकिस्तान की सेना कश्मीर पर कब्जे की योजना बना रही थी.

भारत के इतिहास का काला दिन
पाकिस्तान ने इस योजना पर पहली बार अमल 73 साल पहले 22 अक्टूबर के दिन किया था. 22 अक्टूबर 1947 के दिन पाकिस्तान से आए हजारों कबाइलियों ने कश्मीर पर हमला बोल दिया और राजा हरि सिंह की स्टेट फोर्स को हराकर मुजफ्फराबाद से श्रीनगर जाने वाले रास्ते पर आगे बढ़ना शुरू किया. ये मुजफ्फराबाद ही आज पाकिस्तान ऑक्यूपाइड कश्मीर यानी PoK की राजधानी है. 22 अक्टूबर 1947 का वो दिन भारत के इतिहास में एक काला दिन साबित हुआ क्योंकि इसके कुछ दिनों के बाद जब युद्ध विराम हुआ तो भारत कश्मीर का एक बहुत बड़ा हिस्सा गंवा चुका था जिसका आकार था करीब 91 हजार वर्ग किलोमीटर. ये हंगरी, पुर्तगाल और जॉर्डन जैसे देशों के आकार के बराबर है. इसी हिस्से को आज भारत PoK कहकर बुलाता है जबकि पाकिस्तान इसे आजाद कश्मीर कहता है.

भारत ने कश्मीर को कबाइलियों से दिलाई आजाद 
लेकिन भारत के ज्यादातर दरबारी इतिहासकारों ने 22 अक्टूबर को कभी ब्लैक डे का नाम नहीं दिया और इस युद्ध को धीरे-धीरे जानबूझकर देश के लोगों की याददाश्त से मिटा दिया गया. जबकि जिस पाकिस्तान ने ये युद्ध भारत पर थोपा था उसने ऐसा नहीं किया, पाकिस्तान आज भी 26 और 27 अक्टूबर को ब्लैक डे के रूप में मनाता है, 26 अक्टूबर 1947 को कश्मीर के राजा हरि सिंह ने जम्मू कश्मीर के भारत में विलय के दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए थे और इसके अगले दिन यानी 27 अक्टूबर को भारत ने कश्मीर को कबाइलियों से आजाद कराने के लिए अपनी सेना उतार दी थी.

पाकिस्तान कहता है कि उसने कभी कश्मीर पर हमला नहीं किया और कबाइलियों के हमले में उसका कोई रोल नहीं था, भारत में पाकिस्तान की भाषा बोलने वाले भी बार-बार यही साबित करने की कोशिश करते हैं कि इस हमले में पाकिस्तान की सेना शामिल नहीं थी. लेकिन आज सबूतों और ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर हम आपको बताएंगे कि इस हमले में ना सिर्फ पाकिस्तान की सेना शामिल थी, बल्कि इस हमले को अंजाम ही पाकिस्तान की सेना के नेतृत्व में दिया गया था.

आजाद भारत का सबसे लंबा चलने वाला युद्ध
अक्टूबर 1947 में शुरू हुआ ये युद्ध दिसंबर 1948 तक चला था. ये आजाद भारत का अब तक का सबसे लंबा युद्ध है जो एक वर्ष 2 महीने और 2 हफ्तों तक चला था. लेकिन फिर भी इस सबसे लंबे युद्ध को युद्ध मानने से ही इनकार कर दिया गया. वर्ष 1962 में चीन के साथ भारत का युद्ध सिर्फ एक महीने तक चला था, पाकिस्तान के साथ वर्ष 1965 के युद्ध की अवधि सिर्फ 17 दिन थी, पाकिस्तान के साथ 1971 का युद्ध 13 दिनों तक लड़ा गया था और 1999 का कारगिल युद्ध 60 दिनों तक चला था. लेकिन जो युद्ध भारत 14 महीनों तक लड़ता रहा उसकी बात कोई नहीं करता. वो भी तब जब ये मानव इतिहास के सबसे वीभत्स युद्धों में एक था. 

पाकिस्तान की सेना के इशारे पर जिन कबाइलियों ने कश्मीर पर हमला किया था उनका नारा इतना दिल दहला देने वाला था कि अगर आज आप इसे सुनेंगे तो आप भी हैरान रह जाएंगे. कबाइली हमला करते समय नारा लगाते थे, सिख का सर, मुसलमान का घर और हिंदू की जर. यानी पाकिस्तान की सेना ने कबाइलियों को हुकूम दिया था कि उन्हें जम्मू-कश्मीर में जैसे ही कोई सिख दिखाई दे उसका सिर काट दिया जाए, जैसे ही कोई मुसलमान दिखाई दे, उसका घर जला दिया जाए और हिंदूओं की संम्पत्ति पर कब्जा किया जाए. इस हमले से पहले कश्मीर का नक्शा कैसा दिखाई देता था और इस हमले के बाद कश्मीर का नक्शा कैसा हो गया ये आप खुद देखिए…


बंटवारे के साथ रची गई साजिश
इस पूरे हमले की साजिश भारत के बंटवारे के साथ ही रच ली गई थी. लेकिन इसे बड़े पैमाने पर पहली बार अंजाम दिया गया 22 अक्टूबर 1947 को. इस दिन पाकिस्तान की मुस्लिम लीग नेशनल गार्ड के एक कमांडर खुर्शीद अनवर के नेतृत्व में हजारों कबाइलियों ने कश्मीर पर हमला बोल दिया. इस हमले की योजना भी पाकिस्तान की सेना ने तैयार की थी और हथियार भी पाकिस्तान की सेना ने ही मुहैया कराए थे. उस समय पाकिस्तान की सेना के ज्यादातर सीनियर अफसर ब्रिटिश थे इसलिए हमले की योजना को उनसे भी छिपाकर रखा गया था.

ऑपरेशन गुलमर्ग
पाकिस्तान ने अपनी इस साजिश को नाम दिया था ऑपरेशन गुलमर्ग. ऑपरेशन गुलमर्ग कैसे पाकिस्तान की सेना के दिमाग की उपज था और कैसे पाकिस्तान की सेना ने कबाइलियों की आड़ में आजाद भारत के खिलाफ पहला युद्ध छेड़ दिया था, इसका खुलासा खुद पाकिस्तान की सेना के एक पूर्व अफसर ने अपनी एक किताब में किया है. इस किताब का नाम है ‘Raiders In Kashmir’ और इसके लेखक हैं मेजर जनरल अकबर खान. अकबर खान 1947 में पाकिस्तान की सेना में ब्रिगेडियर के पद पर थे और वो पाकिस्तान की सेना के जनरल हेडक्वाटर में डायरेक्टर ऑफ वेपन एंड इक्विपमेंट भी थे. अकबर खान को उस समय के कश्मीर के राजा हरि सिंह के बारे में अच्छी खासी जानकारी थी और उन्हें ये पता था कि राजा हरि सिंह की स्टेट फोर्स में सिर्फ 9 हजार जवान हैं और इनमें से भी 2 हजार मुसलमान हैं. पाकिस्तान को गलतफहमी थी कि हरि सिंह की स्टेट फोर्स में शामिल ये मुस्लिम जवान पाकिस्तान का साथ देंगे और पाकिस्तान की ऐसी ही गलतफहमियों ने उसकी सेना के अफसरों को अति उत्साह से भर दिया था. 

मेजर जनरल अकबर खान की किताब ‘Raiders in Kashmir’ के दूसरे चैप्टर का नाम है ‘The Cause Why’. इसके पहले ही पन्ने पर वो बताते हैं कि पाकिस्तान ने कबाइलियों को कश्मीर पर हमला करने के लिए क्यों भेजा था.

कश्मीर को लेकर पाकिस्तान की गलतफहमियां
इसमें लिखा है कि उस समय भारत का आकार 46 लाख वर्ग किलोमीटर था जिसमें 568 रियासतें थीं और जहां 40 करोड़ लोग रहते थे, इन रियासतों को ये तय करना था कि वो भारत के साथ रहना चाहती हैं, पाकिस्तान के साथ जाना चाहती हैं या फिर आजाद रहना चाहत हैं. इनमें जम्मू-कश्मीर दूसरी सबसे बड़ी रियासत थी, ये एक ऐसी रियासत थी जो भौगोलिक रूप से ना सिर्फ भारत और पाकिस्तान के लिए बल्कि पूरे भारतीय उपमहाद्वीप के लिए महत्वपूर्ण थी. जम्मू-कश्मीर की भौगौलिक स्थिति उस समय ऐसी थी कि उत्तर में कश्मीर और उस समय के सोवियत संघ के बीच सिर्फ अफगानिस्तान था और इसकी सीमाएं कश्मीर से भी लगती थीं. जब से ब्रिटेन ने भारत के बंटवारे का ऐलान किया था, तभी से पाकिस्तानियों को लगता था कि कश्मीर तो उनके साथ ही जाएगा. पाकिस्तान ने कश्मीर को अपना अभिन्न हिस्सा माना हुआ था और अकबर खान तो ये तक लिखते हैं कि पाकिस्तान की स्पेलिंग में जो Okay है उसका मतलब कश्मीर ही है.

अकबर खान आगे लिखते हैं कि उस समय भारतीय उपमहाद्वीप को हिंदू और मुस्लिम जनसंख्या के आधार पर बांटा जा रहा था इसलिए किसी को इसमें कोई शक नहीं था कि कश्मीर पाकिस्तान के साथ जाएगा. उस समय कश्मीर की 75 प्रतिशत आबादी मुसलमान थी, और उस समय आकार में 2 लाख 18 हजार वर्ग किलोमीटर बड़ा जम्मू-कश्मीर, सड़क, रेल या नदियों के रास्ते भारत से जुड़ा हुआ नहीं था और भारत और कश्मीर के कोई आर्थिक संबंध भी नहीं थे.

और कश्मीर के बारे में यही बातें पाकिस्तान की गलतफहमियों का आधार बन गईं और पाकिस्तान आजादी के साथ ही कश्मीर को हासिल करने के सपने देखने लगा.

कश्मीर को लेकर मोहम्मद अली जिन्ना की सोच
अकबर खान इस किताब में ये भी लिखते हैं कि पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना का मानना था कि भौगौलिक रूप से कश्मीर के पास पाकिस्तान के साथ जाने के अलावा कोई विकल्प नहीं है. मोहम्मद अली जिन्ना का ये भी मानना था कि कश्मीर के लोगों में पाकिस्तान को लेकर बहुत उत्साह था. इसलिए शेख अब्दुल्ला जैसे मुस्लिम नेता विभाजन और कश्मीर के पाकिस्तान में विलय के खिलाफ थे. उनकी राय से कोई फर्क नहीं पड़ता. यानी जिन्ना कश्मीर को लेकर अपनी ही गलतफहमियों के नशे में चूर थे और इसी नशे में उनके देश की सेना कश्मीर पर हमले की योजना बना रही थी.

इस बारे में ZEE NEWS रिटायर्ड मेजर जनरल गोवर्धन सिंह से बात की है. मेजर जनरल गोवर्धन सिंह वर्ष 1947 में ट्रेनी लेफ्टिनेंट थे और जम्मू-कश्मीर की स्टेट फोर्स का हिस्सा थे. मेजर जनरल गोवर्धन सिंह ने ZEE NEWS को बताया कि बंटवारे के बावजूद जम्मू-कश्मीर में पूरी तरह शांति थी लेकिन उस समय की कई अंतरराष्ट्रीय ताकतें चाहती थीं कि कश्मीर पाकिस्तान के साथ चला जाए क्योंकि उस समय अविभाजित कश्मीर की सीमाएं सोवियत संघ से मिलती थीं और ये विदेशी ताकतें सोवियत संघ से युद्ध की स्थिति में अपनी भौगौलिक स्थिति को मजबूत रखना चाहती थीं. और इन्हीं की शह पर पाकिस्तान ने कश्मीर पर हमले की योजना बनाई थी.

यानी ये संभव है कि वर्ष 1947 में कश्मीर पर हुआ हमला एक अंतरराष्ट्रीय साजिश का हिस्सा था. लेकिन इसमें पाकिस्तान के लिए भी बहुत सारे फायदे छिपे थे. कश्मीर पाकिस्तान के लिए सिर्फ पसंद नहीं बल्कि जरूरत का विषय था. क्योंकि पाकिस्तान को ये डर था कि अगर भारत की सेना कश्मीर तक आ गई तो वहां से पाकिस्तान पर नजर रखना बहुत आसान हो जाएगा और पाकिस्तान के लिए भारत के खिलाफ कोई भी हरकत करना आसान नहीं होगा. इस बात का जिक्र भी मेजर जनरल अकबर खान ने अपनी किताब Raiders In Kashmir में किया है.

कश्मीर को पाकिस्तान में मिलाने का प्लान!
अकबर खान अपनी इस किताब में बताते हैं कि कश्मीर पर हमले से कुछ समय पहले उनकी मुलाकात मुस्लिम लीग के एक नेता से हुई थी जिसका नाम था मियां इफ्त-खारुद्दीन. इस नेता ने अकबर खान से कहा कि वो कश्मीर को पाकिस्तान में मिलाने के लिए एक प्लान बनाएं जिसे लाहौर में बैठै पाकिस्तानी नेताओं को दिखाया जा सके और उस पर मुहर लगवाई जा सके.

लेकिन इस योजना को बनाते हुए इस बात का खास ध्यान रखा जाना था कि इसमें पाकिस्तानी सेना के या पाकिस्तानी अधिकारियों के शामिल होने की बात किसी को पता ना चले. अकबर खान को कबाइलियों के लिए हथियार जमा करने की जिम्मेदारी दी गई थी.

अकबर खान खुद अपनी किताब में बताते हैं कि उस समय पाकिस्तान की पंजाब पुलिस को four हजार मिलिट्री राइफल (Army Rifles) दी गई थीं. लेकिन ऐसा लगता था कि पाकिस्तान की पंजाब पुलिस को इन राइफलों की जरूरत नहीं है. इसलिए इन राइफलों को कबाइलियों को सौंपने का फैसला किया गया.

अकबर खान अपनी योजना को लेकर बहुत उत्साह में थे. उन्होंने इसका जिक्र पाकिस्तानी सरकार के कई अधिकारियों से किया और अकबर खान ने इन अधिकारियों को जम्मू-कश्मीर के कठुआ रोड और श्रीनगर पर कब्जे की अहमियत समझाई. इसके बाद अधिकारियों ने अकबर खान की मीटिंग पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री लियाकत अली खान के साथ फिक्स कर दी. जब अकबर खान ने लियाकत अली खान को इस योजना के बारे में बताया तो पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने उनसे कहा कि इसके लिए आपको पैसे मिल जाएंगे.

अभिवाजित कश्मीर पर पहला हमला
इसके बाद 22 अक्टूबर को कबाइलियों ने उस समय के अभिवाजित कश्मीर के डोमेल पर पहला हमला किया, 23 तारीख को कबाइलियों ने मुजफ्फराबाद पर भी कब्जा कर लिया. 25 तारीख तक कबाइली उरी पर कब्जा कर चुके थे. इन आक्रमणकारियों का अगला निशाना बारामुला था. जहां 26 तारीख को धावा बोला गया और कब्जा कर लिया गया 26 अक्टूबर की तारीख भारत और पाकिस्तान दोनों देशों के इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण तारीखों में से एक है. 

बारामुला से श्रीनगर की दूरी करीब 50 किलोमीटर है और पाकिस्तान की सेना और कबाइलियों का अगला निशाना श्रीनगर ही था. लेकिन इस बीच कबाइलियों ने बारामुला में जो अत्याचार किया उसके बारे में भी आपको जान लेना चाहिए.

कबाइलियों के अत्याचार की कहानी
अकबर खान ने खुद अपनी किताब Raiders In Kashmir में लिखा है कि उस समय बारामूला की आबादी 14 हजार थी, जिसमें से सिर्फ three हजार लोग जिंदा बचे थे. बारामूला उस समय बहुत समृद्ध हुआ करता था, जहां बड़ी संख्या में स्कूल, बाजार और दुकानें हुआ करती थीं और आर्थिक रूप से भी बारामूला कश्मीर के लिए बहुत महत्वपूर्ण था. लेकिन कबाइलियों ने यहां के लोगों का खून बहाना शुरू कर दिया. बारामूला के मशहूर चर्च St. Joseph’s Catholic Church में आग लगा दी गई, इस चर्च की लाइब्रेरी को जला दिया गया और चर्च की महिलाओं के साथ बलात्कार किया गया और कई महिलाओं का कत्ल कर दिया गया. 

पाकिस्तान का प्लान हुआ धराशायी
कबाइलियों ने बारामूला में लूट मार करनी शुरू कर दी. लेकिन बारामूला ही पाकिस्तान की सेना और कबाइलियों के गले की हड्डी भी बन गया क्योंकि कबाइली बारामूला को लूटने और वहां लोगों का कत्ल करने में इतने व्यस्त हो गए कि इसी में दो दिन निकल गए. ये सब 26 अक्टूबर और 27 अक्टूबर को हो रहा था. कबाइलियों को श्रीनगर की तरफ बढ़ना था लेकिन वो बारामूला में ही अटक गए. उन्होंने लूटे हुए सामान और अगवा की गई महिलाओं को पाकिस्तान की तरफ भेजना शुरू कर दिया. लेकिन इसी बीच 26 तारीख को जम्मू-कश्मीर के महाराजा हरि सिंह ने भारत के साथ विलय के दस्तावेज पर हस्ताक्षर कर दिए, इसी दिन पाकिस्तान ने मुजफ्फराबाद को कथित आजाद कश्मीर की राजधानी घोषित कर दिया. लेकिन इसके अगले दिन यानी 27 तारीख को भारत की सेनाएं सुबह-सुबह श्रीनगर एयरपोर्ट पर उतरने लगीं और यहीं से कश्मीर पर कब्जे का पाकिस्तान का प्लान धराशायी होने लगा. 

वर्ष 1947 में 26 और 27 अक्टूबर के दिन जब कबाइली बारामूला से आगे नहीं बढ़ पाए तो पाकिस्तान के अधिकारियों ने मेजर जनरल अकबर खान से पूछा कि क्या वो आगे के हमले की जिम्मेदारी लेंगे. लेकिन शर्त ये थी कि इस हमले में औपचारिक रूप से पाकिस्तान की सेना के शामिल होने की बात बाहर नहीं आनी चाहिए. अकबर खान इसके लिए तैयार हो गए. लेकिन जब अकबर खान श्रीनगर से महज 6 किलोमीटर दूर थे तब उन्हें अहसास हुआ कि भारत की सेना ने आगे की सड़कों को ब्लॉक कर दिया है. और कबाइलियों का आगे बढ़ना संभव नहीं है. यहीं पाकिस्तान का कश्मीर वाला प्लान हमेशा के लिए खत्म हो गया.

इसके दो दिनों के बाद भारत की फौज ने आगे बढ़ना शुरू किया और कबाइलियों को पीछे धकेलना शुरू किया और 7 नवंबर 1947 तक कबाइली उरी तक धकेले जा चुके थे.

कश्मीर पर कबाइलियों और पाकिस्तानी सेना का हमला
इस पूरी कहानी से तीन बातें साबित होती हैं. पहली ये कि वर्ष 1947 में जो हमला कश्मीर पर किया गया था वो सिर्फ कबाइलियों का हमला नहीं था, बल्कि इसमें पाकिस्तान की सेना पूरी तरह से शामिल थी. दूसरी बात ये साबित होती है कि पाकिस्तानी सेना के इशारे पर कबाइलियों ने जमकर कश्मीर के लोगों का नरसंहार किया. बच्चों और महिलाओं तक को नहीं छोड़ा. और तीसरी बात ये है कि अगर 27 अक्टूबर 1947 को भारत की सेना श्रीनगर नहीं पहुंचती तो शायद कश्मीर भारत के हाथ से निकल जाता.

भारत और पाकिस्तान का बंटवारा अंग्रेजों ने किया था और इसमें कश्मीर को जानबूझकर विवाद का विषय बनाया गया. कश्मीर विवाद भारत के लिए एक ऐसा जख्म बन गया जो आज तक ठीक से भर नहीं पाया है. इस देश में बहुत सारे आक्रमणकारी आए और सभी ने भारत का बहुत नुकसान किया. लेकिन अंग्रेज जो करके गए उसे भारत की आने वाली पीढ़ियां कभी नहीं भुला सकतीं. इसलिए आज हमने आपको कश्मीर की वो अनकही कहानी सुनाने की कोशिश की है..जिसे पूरी दुनिया से लगभग छिपाकर रखा गया.

नेहरू की गलती
27 अक्टूबर 1947 के बाद से कबाइली तो कश्मीर से पीछे हटने लगे थे लेकिन 2 लाख 22 हजार 236 वर्ग किलोमीटर में फैले कश्मीर का आधा हिस्सा पाकिस्तान के पास जा चुका था. बाद में पाकिस्तान ने इसके कुछ हिस्सों को चीन को भी सौंप दिया. लेकिन क्या आप जानते हैं कि कबाइलियों को पीछे धकेलने के बाद भी भारत PoK को हासिल करने में क्यों नाकाम रहा. ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू 1 जनवरी 1948 को इस पूरे विवाद को संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद में ले गए थे और यहीं से ये विवाद अंतरराष्ट्रीय विवाद में बदल गया.

कुल मिलाकर 73 वर्ष पहले हिंदुओं और मुसलमानों के बीच नफरत की एक दीवार खड़ी की गई और इसी दीवार को पहले भारत के बंटवारे का और फिर कश्मीर पर हमले का आधार बनाया गया. और भारत धर्म की इस दीवार को आज तक गिरा नहीं पाया.

इस्लामिक कट्टरपंथियों को फ्रांस की खुली चुनौती
इस दीवार को मजबूत करने का काम भारत के इस्लामिक कट्टरपंथियों ने भी किया है. लेकिन फ्रांस ने इस्लामिक कट्टरपंथियों के खिलाफ निर्णायक जंग का ऐलान कर दिया है. फ्रांस की राजधानी पेरिस में सरकारी दफ्तरों पर पैगंबर मोहम्मद साहब के उस कार्टून को डिस्प्ले किया जा रहा है, जिसे क्लास में दिखाने पर फ्रांस में एक टीचर सैमुअल पैटी (Samuel Paty) की गला काट कर हत्या कर दी गई थी. एक टीचर की हत्या के बाद से पूरे फ्रांस में इस्लामिक कट्टरपंथ के खिलाफ जबरदस्त आक्रोश है. फ्रांस ने टीचर सैमुअल पैटी को अपने सबसे बड़े नागरिक सम्मान लीजन ऑफ ऑनर (Legion of Honour) से सम्मानित किया है. शोक सभा के दौरान सर्वोच्च सम्मान के मेडल को उनके ताबूत पर रखा गया. बीते एक हफ्ते से पूरे फ्रांस में सैमुअल पैटी के समर्थन में प्रदर्शन हो रहे हैं. फ्रांस की सरकारी इमारतों में शार्ली हेब्दो पत्रिका में छपे पैगंबर मोहम्मद के उन कार्टून को भी दिखाया जा रहा है जिन्हें छापने पर वर्ष 2015 में पत्रिका के दफ्तर में आतंकवादी हमला किया गया था.

फ्रांस ने इस्लामिक कट्टरवाद को जवाब देने का जो रास्ता चुना है उससे पूरी दुनिया सीख ले सकती है. जिस कार्टून को क्लास में दिखाने पर टीचर की हत्या की गई उन्हें बड़ी-बड़ी स्क्रीन पर दिखाया जा रहा है और इस्लामिक आतंकवादियों को सीधी चुनौती दी जा रही है कि आओ इन तस्वीरों को देखो और फ्रांस के खिलाफ जो कर सकते हो करके दिखाओ. फ्रांस एक धर्मनिरपेक्ष देश है लेकिन वहां धर्मनिरपेक्षता के नाम पर किसी धर्म का तुष्टिकरण नहीं किया जाता है.

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