नई दिल्ली: बिहार चुनाव (Bihar Meeting Elections 2020)   को लेकर राजनीतिक गलियारे में हलचल तेज हो गई है. इस बीच देश के गृह मंत्री अमित शाह ने ZEE NEWS के एडिटर इन चीफ सुधीर चौधरी के साथ खास बातचीत की है. बातचीत की शुरुआत में में गृह मंत्री ने देशवासियों को नवरात्रि की शुभकामनाएं दीं. उन्होंने बिहार चुनाव को लेकर रणनीतिक प्लान के बारे में विस्तार से बताया. उन्होंने कहा कि शक्ति पर्व हम ऐसे मनाएं कि कोरोना परास्त करने में मदद मिले. गृह मंत्री ने देशवासियों से मास्क पहनने, 2 गज की दूरी बनाए रखने और स्वच्छता का खास ध्यान रखने का अनुरोध किया. उन्होंने कहा कि देश की प्रगति के लिए शक्ति पर्व से जो नया समय शुरू हुआ है, वो देश को काफी आगे ले जाने वाला हो.

आइए जानते हैं अमित शाह ने किन-किन सवालों के जवाब दिए
सवाल- इस साल अपने स्वास्थ्य की वजह से काफी चर्चा में रहे, आपका स्वास्थ्य कैसा है? 
जवाब- मेरी दुश्मनी किसी से नहीं, मेरी विचारधारा और कार्यपद्धति से किसी को आपत्ति हो सकती है, मैं बिलकुल स्वस्थ हूं. 

सवाल- बड़े नेता स्वास्थ्य को लेकर सीक्रेटिव रहते हैं.
जवाब- मैं सीक्रेटिव नहीं, 20 मिनट में ट्वीट करके बताया कि कोरोना पॉजिटिव हूं. 

सवाल- बिहार चुनाव में आपका पहला एक्सपोजर मिलने वाला है, 2015 से इस बार की स्थिति में आप क्या अंतर देखते हैं?
जवाब- 2015 में अच्छी स्थिति थी, सामाजिक समीकरण हमारे पक्ष में नहीं थे इसलिए हम चुनाव हारे. इस बार सबकुछ उल्टा है. सामाजिक समीकरण हमारे पक्ष में हैं. कोरोना काल में सरकार ने 60 करोड़ गरीबों की चिंता की. चाहे लघु उद्योग हों या बड़े उद्दोग सरकार ने सभी की चिंता की. बिहार सरकार ने भी अच्छा काम किया है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार, नीतीश कुमार के नेतृत्व में बिहार सरकार ने कोरोना के वक्त में जो काम किया वो हमारी जमापूंजी है. समाजिक समीकरण हमारे पक्ष में हैं.

सवाल- प्रवासी मजदूरों की समस्या पर बिहार चुनाव पहला रेफरेंडम है, उसका नुकसान होगा या लाभ? 
जवाब- बिहार में 1500 से ज्यादा ट्रेनें गई हैं. ढाई करोड़ मजदूरों को पहुंचाया गया. 

सवाल- सरकार का मिस कम्युनिकेशन था या मीडिया हाइप?
जवाब- कुछ कम्युनिकेशन गैप और कुछ मजदूरों के धैर्य खौने की वजह से हुआ.

सवाल- इस समय जो सबसे बड़ा कन्फ्यूजन है, वो है बिहार में एलजेपी, चिराग पासवान को लेकर. आपको क्या लगता है एलजेपी इधर है या उधर? 
जवाब- एलजेपी की ओर से मैं कुछ नहीं कह सकता, एनडीए और बीजेपी की ओर से कहना चाहता हूं कि बिहार चुनाव में एलजेपी एनडीए का हिस्सा नहीं है. बीजेपी-जेडीयू-हम और वीआईपी नीतीश के नेतृत्व में चुनाव लड़ रहे हैं. नीतीश के नेतृत्व में एनडीए बिहार चुनाव लड़ रहा है. इसमें एलजेपी कहीं भी नहीं है.

सवाल- चिराग पासवान का पीएम मोदी को लेकर ये बयान कि मोदीजी मेरे दिल में ऐसे बसते हैं, आप मेरा दिल चीरकर देख लें तो उसमें मोदी जी की तस्वीर मिलेगी ये कन्फ्यूजन फैलाने के लिए है?
जवाब- ऐसा तो कई विपक्षी दलों के मन में है.

सवाल- आपको ऐसा लग रहा है कि चिराग पासवान कुछ ज्यादा महात्वकांक्षी हो रहे हैं?
जवाब-  एनडीए की ओर से एलजेपी से चर्चा की गई, उन्हें पर्याप्त  सीटें भी ऑफर की गईं. लेकिन वो नहीं माने और गठबंधन तोड़ दिया. अब वो बिहार में हमारे गठबंधन में नहीं हैं. 

सवाल- लेकिन केंद्र में वो गठबंधन में बने हुए हैं? 
जवाब-  अभी बिहार चुनाव की स्थिति है, उसके बाद देखेंगे.

सवाल- एलजेपी का कहना है कि वीआईपी के लोगों को आपने कुछ ज्यादा ही वीआईपी स्टेटस दे दिया. जबकि ऐसा नहीं होना चाहिए था. वीआईपी को वीवीआईपी बना दिया.
जवाब-  पिछड़े और वंचितों को ज्यादा स्थान दिया जाए. 2-Three सीट ज्यादा भी मिल गई तो क्या हो गया. 

सवाल- नीतीश को लेकर बिहार में उत्साह उतना नहीं है?
उत्तर-
मैं ऐसा नहीं मानता. बिहार की जनता कांग्रेस के 10 साल, लालू के 15 साल और नीतीश के 15 साल का कंपेरिजन जरूर  करेगी. 25 साल की अस्थिरता और जंगलराज का ध्यान जरूर रखा जाएगा.

सवाल- इस बार लालू यादव प्रचार नहीं कर पाएंगे, बिहार में कहावत थी कि समोसा बिना आलू के चल सकता है, लेकिन बिहार बिना लालू के नहीं. तो क्या आपको इसका एडवांटेज मिलेगा?
जवाब- चारा घोटाले के चलते लालू जेल में हैं.

सवाल- लालू ने सत्ता का ट्रांसफर किया है, अब उनके बेटे चुनाव में हैं. आपको लगता है कि बिहार की जनता उन्हें स्वीकार करेगी? 
जवाब- यदुवंशियों में काफी रोष है कि परिवारवाद कि लालू राजनीति कब तक चलाएंगे. मोदी की सबसे बड़ी उपल्ब्धि है कि उन्होंने परिवारवाद, भ्रष्टाचार और तुष्टिकरण को समाप्त कर दिया और विकास को स्थापित किया. 

सवाल- जब आप अध्यक्ष थे तब भी बीजेपी बिहार नहीं जीत पाई, बिहार में लगता है कि बीजेपी जूनियर पार्टनर की तरह से लड़ रही है. क्या बीजेपी ने स्वीकार कर लिया है कि बीजेपी बिहार में जूनियर पार्टनर है?  
जवाब- कम ज्यादा का सवाल नहीं है. नीतीश कुमार ने 15 साल में काफी अच्छा काम किया है. हम एक होकर चुनाव लड़ रहे हैं. नतीजे अच्छे आने वाले हैं. 

सवाल- मान लीजिए ये हो भी जाता है, बिहार चुनाव के बाद क्या केंद्र में एलजेपी के कोटे से एक और मंत्री आएगा? 
जवाब- इसफर मैं अकेला निर्णय नहीं कर सकता.

सवाल- कोविड 19 के बाद ये देश में पहला चुनाव है, पहले और अब में क्या अंतर है? क्या कोई नई तैयारी की गई है? 
जवाब- सभी दलों को तैयारी करनी होगी. कुछ नए प्रयोग करने होंगे. हो सकता है चुनाव खर्च हमेशा के लिए कम हो जाए. वर्चुअल रैलियों की परंपरा चालू रहे.

सवाल- क्योंकि बीजेपी ऐसी पार्टी रही है जिसने शुरू से IT पर काफी जोर दिया है. आप रणनीतिकार हैं, जब आपने कोरोना के लिए काम किया तो क्या बिहार में इलेक्शन रणनीति ड्राफ्ट करने में कोई फायदा मिला? 
जवाब- हमारी आईटी सेल ने काफी मेहनत की है. हमने कई सफल वर्जुअल रैलियां कीं. हमारा वर्चुअल प्रचार का तंत्र Three महीने पहले से तैयार है. ये दिखाई दे रहा है कि हमें फायदा होा. 

सवाल- सामाजिक संतुलन के लिए आप नीतीश के कंधों पर निर्भर हैं, नीतीश कुमार पीएम मोदी पर निर्भर है. कौन किसके कंझे पर है?
जवाब- जब साथी होते हैं तो सब बराबर होते हैं. मोदी राष्ट्रीय स्तर पर नेतृत्व कर रहे हैं. नीतीश राज्य के स्तर पर, छोटे-बड़े का भाव रखने की जरूरत नहीं है.

सवाल- अगर बिहार बीजेपी की 2015 से भी खराब परफॉरमेंस रही तो क्या ये मोदी सरकार, चीन, कोरोना वायरस और रोजगार इन सब पर रेफरेंडम माना जाएगा?
जवाब- हम 2 तिहाई बहुमत से चुनाव जीत जाएंगे इसलिए रेफरेंडम बोलते हुए डर रहे हैं.

सवाल- कहा जा रहा है कि दुनिया में कोरोना का सेकेंड वेव आ रहा है. क्या भारत में सेकेंड लॉकडाउन के लिए आप लोगों ने कुछ सोचा है?
जवाब- हम लोगों ने सावधानी के कार्यक्रम शुरू किए हैं. लॉकडाउन की नौबत नहीं आएगी.

सवाल- राहुल तो अभी भी मानने को तैयार नहीं (लॉकडाउन सही था)
उत्तर- उन्हें हर चुनाव में जनता ही मनाएगी.

सवाल- शशि थरूर ने पाकिस्तान में कहा- कोविड पर पाकिस्तान ने भारत से ज्यादा अच्छा काम किया. कांग्रेस के नेता पाकिस्तान में काफी दिलचस्पी दिखाते हैं, जब आपके देश का ही नेता पाकिस्तान में कहता है कि पाकिस्तान भारत से बेहतर है.
जवाब- वोटबैंक की राजनीति के लिए पाकिस्तान की पीठ थपथपाना कोई नई बात नहीं. मैं देश की जनता से कहना चाहता हूं कि देश के सम्मान को ताक पर रखने वालों को पहचाने की जरूरत है.

सवाल- मीडिया में कुछ और चल रहा है, छह महीने में मीडिया की काफी आलोचना हुई इस वक्त भी सिर्फ सुशांत की खबरें ही चलती रहीं.
जवाब- मीडिया को बैलेंस करने की जरूरत है. खबर खबर होती है. खबर मार्केटिंग की चीज नहीं होती. 

सवाल-  बिहार में सुशांत बड़ा चुनावी मुद्दा बन चुके हैं?
जवाब- हो सकता है कि कुछ लोग इस मुद्दे पर भी वोट डालें मगर दो चीजें एक साथ हुईं. इतना विवाद हुआ. मुझे आश्चर्य इस बात का था कि महाराष्ट्र सरकार ने क्यों सीबीआई को केस पहले नहीं दे दिया. इस मामले में सुप्रीम कोर्ट को फैसला करना पड़ा. परिवार की मांग पर पहले ही सीबीआई को केस दे देते तो बात खत्म हो जाती. खैर, मीडिया ने भी इस मामले को ज्यादा तूल दिया.

सवाल- एनसीबी आपके अधीन है, सीबीआई भी आपके पास है तो क्या आपने कुछ उनको निर्देश दिया?
जवाब- एजेंसियों को मेरा निर्देश देने का कोई सवाल ही नहीं बनता. सभी स्वतंत्र रूप से जांच कर रहे हैं. मामले की न्यूट्रल जांच होनी चाहिए. नरेंद्र मोदी सरकार इस बात में विश्वास नहीं रखती कि एजेंसियों की जांच में कोई राजनीतिक निर्देश दिए जाएं.

सवाल- तो आपकी तरफ से इस मामले को लेकर कोई ब्रीफिंग नहीं थी?
जवाब- ब्रीफिंग एक भी नहीं हुई. हमने इतना कहा है कि जो सच है, उसे जनता के सामने रखिए. अदालत के सामने रखिए.

सवाल- पिछले 6 महीनों में अदालतों और थानों में मीडिया को लेकर जितने मामले आए उतने पहले नहीं देखे गए. अदालत सरकार से पूछती है कि आप क्या कर रहे हैं? थानों में मामले जाते हैं तो राजनीति होती है. क्या टीआरपी घोटाले को लेकर आप चिंतित हैं?
जवाब- संदेहास्पद स्थिति किसी भी क्षेत्र में हो, वो समाज और सरकार के लिए चिंता का विषय होती है. इस मामले पर मैं अभी कुछ नहीं सकता लेकिन जिस प्रकार से विगत कुछ दिनों से न्यूज आ रही हैं, मुझे लगता है कि व्यवस्था को चुस्त-दुरुस्त करने की जरूरत है और कम से कम इसमें राजनीति नहीं होनी चाहिए.

सवाल- मैं यहां रेग्युलेशन की बात नहीं कर रहा हूं, लेकिन क्या आपको लगता है कि यूनिफॉर्मिटी नहीं है पूरे देश में? ये अच्छी बात है कि मीडिया के पास सेल्फ रेग्युलेशन है और वैसा ही रहना चाहिए. लेकिन जो हमारे देश के कानून हैं उनका भी पालन होता रहे, ये भी सुनिश्चित करना जरूरी है?
जवाब- मीडिया के लोग और अदालत ही मिलकर इसे ठीक कर सकते हैं क्योंकि हम करने भी जाएं तो इसका गलत अर्थ निकलेगा. मीडिया के लोग और जो संस्थाएं बनी हुई हैं उन्हें और अदालत को ही इसको ठीक करना होगा. 

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सवाल- बंगाल में जो कुछ हो रहा है क्या आपको लगता है कि ये सही समय है यहां राष्ट्रपति शासन लगाने का? आप इसके पक्ष में हैं?
जवाब- मैं राष्ट्रपति शासन लगना चाहिए या नहीं लगना चाहिए इसके बारे में कुछ नहीं कहना चाहता. परंतु इतना जरूर कहूंगा कि बंगाल में चिंताजनक स्थिति है. राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों की हत्या करना, हत्या होना, और बाद में उसी दल के लोगों को हत्या में फंसा देना, खुलेआम सड़क पर शूट-आउट होना, हर जिले में बम के कारखाने मिलना, प्रशासन चरमरा गया है. कोरोना की पूरी व्यवस्था टूट पड़ी है. हर तरह से प्रशासन चरमरा गया है और बंगाल की जनता त्राहि-त्राहि कर रही है. हम तो वहां विपक्ष में हैं, संघर्ष कर रहे हैं, जनता की आवाज को बुलंद कर रहे हैं. हमारे कार्यकर्ताओं की हत्याएं हो रही हैं, दमन हो रहा है. मैं मानता हूं कि शायद ही देश में ऐसा कोई राज्य होगा, जिसमें राजनीतिक मतभेदों के कारण इतनी हत्याएं बीते कुछ दिनों में हुई होंगी. जो बंगाल की स्थिति है वो चिंताजनक तो है ही, राष्ट्रपति शासन एक अलग विषय है. इसके संवैधानिक पैरामीटर्स भी हैं. इसकी एक प्रक्रिया होती है परंतु प्रदेश में चिंताजनक हालत हैं.

सवाल- जब ममता बनर्जी विपक्ष में थीं, तब यही आरोप वो सीपीएम के खिलाफ लगाती थीं और तब राष्ट्रपति शासन की मांग भी करती थीं, क्या आप उस बेंचमार्क्स से आप जाना चाहेंगे?
जवाब- मांग तो हमारे कार्यकर्ता भी कर रहे हैं. बीजेपी के कार्यकर्ता भी मांग कर रहे हैं लेकिन सरकार को बैलेंस तरीके से सोचकर आगे बढ़ना होता है.

सवाल- जब आप और प्रधानमंत्री कोविड-19 को लेकर मुख्यमंत्रियों के साथ बैठक करते थे तो ऐसे कुछ मुख्यमंत्री भी थे जिन्होंने आपको कोई सपोर्ट नहीं किया, कोई कोऑर्डिनेशन नहीं दिखाया.
जवाब- बंगाल ने ही ऐसा किया है. बाकी किसी राज्य से हमें कोई दिक्कत नहीं आई. यहां तक कि कांग्रेस और कम्युनिस्ट शासन वाले राज्यों ने भी सरकार का सपोर्ट किया. क्योंकि ये मामला ही ऐसा है जिसमें पार्टी पॉलिटिक्स नहीं होनी चाहिए. प्रधानमंत्री ने भी जिसको जैसी आवश्यकता थी वैसी मदद पहुंचाने की कोशिश की. सबके साथ बात लगातार बातचीत की. मैं भी करता था. कई बार लंबी बातें हुईं, कई बार टीमें भी यहां से भेजी गईं, टीमें अपना काम करके वापस आ गईं. रिकवरी रेट भी सुधरा डेथ रेट भी कम हुआ. 90 प्रतिशत देश में इस बात पर आम सहमति थी कि पीएम के नेतृत्व में एकजुट होकर लड़ाई लड़नी है. सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने प्रधानमंत्री के नेतृत्व में कोरोना से लड़ाई को अच्छे से लड़ा है.

सवाल- जब धारा-370 हटी तो आप पोस्टर ब्वॉय थे, उस निर्णय के… प्रधानमंत्री ने आपकी तारीफ की. लेकिन फारुक अब्दुल्ला, उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती तीनों के तेवर अब भी वही हैं, जैसा पहले होते थे. तीनों ने वही भाषा का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है, जो वो पहले करते थे. तो अब ये जानने की जरूरत है कि एक वर्ष की हिरासत के बाद क्या आपका जो उद्देश्य था वो पूरा हो चुका है?
जवाब- काफी हद तक तो हुआ है लेकिन कोविड के कारण गति थोड़ी धीमी हुई है. वहां पर कोविड का प्रकोप था और भारत सरकार भी स्वाभाविक रूप से कोरोना के खिलाफ लड़ाई लड़ने में व्यवस्त थी. अभी चार-पांच महीने से फिर से वहां काम की गति बढ़ी है. मुझे लगता है कि 70 वर्ष तक कश्मीर ने जो विकास नहीं देखा है, वो हम अगले एक साल में दिखाने में सफल होंगे. जन-जन तक मदद पहुंचाने की कोशिश की गई है. हर गांव में बिजली पहुंचाने का काम शुरू हो गया है, हर गांव में पानी पहुंचना शुरू हो गया है. पंचायत के चुनाव अच्छे से हो गए. जिला पंचायत के चुनाव एक-दो दिन में ही घोषित होने वाले हैं तो तीन स्तरीय हमारी जो पंचायती व्यवस्था है, वो जम्मू-कश्मीर में भी लागू हो जाएगी. स्थानीय लोगों को अधिकार मिलेंगे. स्थानीय लोग अपनी जरूरत के हिसाब से बजट की योजना बना पाएंगे और धीरे-धीरे कश्मीर पटरी पर आ रहा है. जहां तक कश्मीर में कानून व्यवस्था का सवाल है- सबकुछ कंट्रोल में है. आतंकवाद हो या अंदरूनी कानून व्यवस्था- कोई बड़ी घटनाएं नहीं हुई हैं और अच्छे से हम काम कर रहे हैं. जहां तक अब्दुल्ला और मुफ्ती परिवार का सवाल है, तो उनका ये करना स्वाभाविक है क्योंकि 370 की आड़ में इतने वर्ष तक वहां का शासन उन्होंने भोगा है. गरीब को गरीब रखने का काम उन्होंने किया है. कश्मीर में विकास नहीं पहुंचा है. आप कल्पना नहीं कर सकते, इतना भ्रष्टाचार हुआ है. ये भ्रष्टाचार बहुत बड़ी खदान थी जो आज बंद पड़ी है. 

सवाल- लेकिन महबूबा तो सुप्रीम कोर्ट तक भी गईं, ये जानने के लिए कि उन्हें घर में नजरबंद करके रखा क्यों? आप गृह मंत्री हैं, आप देश को ये बता सकते हैं कि उनको घर में नजरबंद करके क्यों रखा गया? कारण क्या था?
जवाब- हाउस अरेस्ट में नहीं रखा, पहले तो अरेस्ट में ही रखा था. जब 370 को हटाया गया तो प्रचार करके लोगों की भावना को भड़काने का काम ना कर पाएं, और जिस प्रकार के बयान उस वक्त आते थे, आग लग जाएगी, हाथ कट जाएंगे, ये करेंगे, वो करेंगे. मुझे लगता है कि उचित ही कदम था. जैसे ही स्थिति नॉर्मल हुई, सब बाहर आए. पार्टी भी चला रहे हैं. वो पार्टी चलाएं. हमें कोई आपत्ति नहीं है. इस देश में कई पार्टियां हैं. चलती हैं, तो जम्मू-कश्मीर में भी चलनी चाहिए.

सवाल- लेकिन जब सरकारी बंगले और सरकारी सुरक्षा में बैठकर ये तीनों लोग सबकुछ भारत सरकार का इस्तेमाल करें और चीन से मिलने की बात करें, कहें कि चीन से मिलकर हम 370 की बहाली करा लेंगे तो क्या हमारे देश का कानून इस पर खामोश है?
जवाब- कानून समय पर अपना काम करेगा. लेकिन मैं इसे उचित नहीं मानता. ये भाषा उचित नहीं है.

सवाल- इन लोगों पर कोई कार्रवाई? 
जवाब- जम्मू-कश्मीर सरकार से रिपोर्ट मिलने के बाद कार्रवाई की जाएगी. इसको हम उचित नहीं मानते.

सवाल- आपको ऐसा लगता है कि चीन को समझने में हम लोगों से गलती हुई?
जवाब- दो चीजें हैं. मैं आपकी बात से बिल्कुल सहमत नहीं हूं. किसी भी व्यक्ति से रिश्ते सुधारने का प्रयास करना, इसमें कोई बुराई नहीं हो सकती. बिगड़े हुए रिश्ते पड़ोसियों से सुधारने ही चाहिए. मगर सुधारने की ललक में हमारे हितों की बलि नहीं चढ़नी चाहिए. हमने रिश्ते सुधारने का प्रयास किया, जब भी हमें लगा कि हमारी सीमाओं पर अतिक्रमण का प्रयास हो रहा है, हमने आंख में आंख डालकर जवाब दिया है. ये 1962 वाली स्थिति नहीं है. रिश्ते सुधारने का प्रयास हमने पाकिस्तान से भी किया था, चीन से भी किया था. करना भी चाहिए. लेकिन जब वो अलग तरीके से बर्ताव करेंगे, तो उस समय हमारा स्टैंड अलग होगा और देश की सीमाओं की सुरक्षा के लिए कटिबद्धिता का होगा. जो मोदी सरकार ने अच्छे ढंग से करके दिखाया है.

सवाल- तो क्या हम टू-फ्रंट वॉर के लिए भी तैयार हैं, जैसा कि अभी बात हो रही है पाकिस्तान और चीन के दोनों फ्रंट एक साथ अगर खुलते हैं तो?
जवाब- मैं नहीं मानता ऐसी नौबत आएगी. अभी कूटनीतिक स्तर पर भी बात हो रही है और सेना के अधिकारियों के बीच भी बातचीत चल रही है. आशा करनी चाहिए, रास्ता निकल आएगा, अच्छा रास्ता निकल आएगा. मगर मैं इतना कह सकता हूं कि भारत की एक इंच की भूमि पर कोई अतिक्रमण नहीं कर पाएगा. ये भारत सरकार का अटल निर्णय है.

सवाल- लेकिन गलवान के बाद चीन ने अतिक्रमण किया है या नहीं किया है?
जवाब- अभी मैं फिर से एक बार कह रहा हूं कि भारत की भूमि पर एक इंच, अतिक्रमण छोड़ दीजिए, गप्पे लगाते हैं कि 12 किलोमीटर अंदर आ गए, 30 किलोमीटर अंदर आ गए, एक इंच की भूमि भी हमारी हम किसी के भी हाथ में नहीं जाने देंगे.

सवाल- राहुल गांधी ने कहा था कि उनके पास 15 मिनट वाला फॉर्मूला है, तो आप उनसे भी सीख सकते हैं?
जवाब-
वो 1962 में ही फॉर्मूला इस्तेमाल कर लेते, तो भारत की हजारों वर्ग हेक्टेयर भूमि न चली जाती. उस वक्त के प्रधानमंत्री ने तो असम को कह दिया था ‘बाय-बाय असम’ आकाशवाणी पर और कांग्रेस पार्टी हमें ये नसीहत दे रही है. आपके परनाना की सरकार थी, तभी जमीन जाती रही है. हमारे समय में हमने कम से कम डटकर मुकाबला किया है. मैं तो गर्व करता हूं बिहार रेजीमेंट के उन जवानों पर जिन्होंने हड्डियां गलाने वाली ठंड में भी रात को मुस्तैद रहकर हमारे देश की सीमा की सुरक्षा की है और चीनी सैनिकों को जवाब दिया. शहीद भी हुए हैं.

सवाल- लेह में जब आप अपना लोकेशन फीड करते हैं तो लेह को वो जम्मू-कश्मीर को चीन का हिस्सा दिखा रहे हैं. उनके फोन में जो मैप्स हैं वो अरुणाचल प्रदेश को भारत का हिस्सा दिखा ही नहीं रहे हैं तो ये एक IT वॉर में भी तब्दील हो गया है अब?
जवाब-
ये आज से नहीं है. आजादी के समय से, 1962 से ये चल रहा है.
हम इसके खिलाफ लड़ रहे हैं. हम इसके सख्त खिलाफ हैं. 

सवाल- कोई हल देख रहे हैं आप भविष्य में?
जवाब-
हल तो अब वार्ता से ही आ सकता है. वार्ता चल रही है. उम्मीद करनी चाहिए कि वार्ता से हल निकले.

सवाल- अभी तक अपने देश में दीवाली जब भी आती थी, तो चीन की अच्छी-खासी भूमिका रहती थी बाजारों में, इस बार कुछ कमी देखते हैं आप दीवाली पर?
जवाब-
निश्चित रूप से बाजारों में कमी दिखाई पड़ती है. मैं अखबार ज्यादा पढ़ता हूं, बाजारों में तो गया नहीं लेकिन देश की जनता के मन में गुस्सा तो है.

सवाल- आप बीमार रहे. कोविड-19 से आपने मुकाबला किया. व्यक्तिगत तौर पर और एक नेता के तौर पर नई स्थिति ने आपको कैसे बदला है? 
जवाब- काफी लंबे वक्त से मुझे पढ़ाई-लिखाई का समय नहीं मिला था. डेढ़ महीने में मुझे पढ़ाई-लिखाई का समय मिल गया. दूसरी बात, कई सारी चीजों को पीछे मुड़कर देखने का, सोचने का समय भी मिला. कई गलतियां मुझ से स्वयं से कहां हुईं, क्या हुईं, इसके बारे में भी सोचा और आगे वो गलती ना हो इसके लिए अपने आपको तैयार भी किया. विशेषकर पढ़ाई-लिखाई पर मेरा ज्यादा ध्यान रहा. ईश्वर की कृपा से मैं इतना बीमार नहीं रहा कि पढ़ने-लिखने में बाधा आए, संपर्कविहीन जरूर रहा लेकिन कमरे के अंदर स्थिति इतनी कभी बिगड़ी नहीं थी कि लिखने-पढ़ने में मुझे कोई तकलीफ हो, तो बहुत ज्यादा समय तो पढ़ाई-लिखाई में ही गया है.

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