पिछले 72 सालों से पाकिस्तान (Pakistan) केवल कश्मीर (Kashmir) ही नहीं बल्कि गुजरात (Gujarat) के दो बड़े इलाकों को भी अपने आधिकारिक नक्शे में दिखाता रहा है. वो इन इलाकों पर अपना दावा जताता है हालांकि इस मामले पर वो अंतरराष्ट्रीय मंचों (Worldwide Platform) पर कई बार मुंह की खा चुका है तब भी अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहा.

पाकिस्तान अपना जो हर राजनीतिक नक्शा प्रकाशित करता है, उसमें पाकिस्तान के सर्वे विभाग के अलावा पाकिस्तान सरकार की सीधी भागीदारी होती है. इसके बाद भी बंटवारे के बाद से वो लगातार ये हरकत कर रहा है. इसे उसकी खीझ ही ज्यादा कहा जाना चाहिए.

ये दोनों इलाके गुजरात के हैं. ये जूनागढ़ (Junagadh) और माणावदर (Manavadar) हैं. पाकिस्तान ने इन दोनों इलाकों के भारत में विलय को स्वीकार नहीं किया. हालांकि उसे अच्छी तरह मालूम है कि ये इलाके भारत के अविभाज्य अंग हैं. हकीकत ये है कि उसकी लाख कोशिशों के बाद जूनागढ़ ऐसी रियासत थी, जहां पाकिस्तान को ऐसी धोबी पछाड़ पड़ी कि उसका दर्द उसे हमेशा सालता है.

पाकिस्तान जूनागढ़ को लेकर और भी हरकतें करता है. मसलन वो साल में कुछ वाहनों के लाइसेंस भी जूनागढ़ की प्लेट के नाम पर जारी करता है. खुन्नस में वो इसी इलाके से सटे दमन और दीव को भी भारत का अंग नहीं मानता. अपने आधिकारिक नक्शे में वो इन्हें पुर्तगाल का हिस्सा मानता है. जबकि ये इलाका 1961 में भारत ने पुर्तगाल से ले लिया था.पाकिस्तान बिलबिलाने के अलावा कुछ कर भी नहीं सकता
जूनागढ़ के मामले पर वो कौन सा दर्द है जो पाकिस्तान को सालता रहता है. उसकी कहानी भी दिलचस्प है. बल्कि ये ऐसी चोट है, जिससे ये पड़ोसी मुल्क बिलबिला तो सकता है लेकिन कर कुछ नहीं पाता. पैट्रिक फ्रैंच की किताब “लिबर्टी एंड डेथ” कहती है कि पाकिस्तान को भी मालूम है कि जूनागढ़ भारत का अविभाज्य हिस्सा है. लेकिन इसके बाद भी वो इसे अपने नक्शे में शामिल करता रहा है.

ये है जूनागढ़ के वो नवाब, जिन्होंने पाकिस्तान में विलय पर मंजूरी दी थी. बाद में खुद पाकिस्तान भाग गए. लेकिन उन्हें महसूस होने लगा कि ऐसा करके उन्होंने बहुत बड़ी गलती की है

जिन्ना ने दिखाए थे जूनागढ़ नवाब को बड़े-बड़े सपने 

इसकी कहानी कुछ यूं है. काठियावाड़ राज्यों के समूह के हिस्से जूनागढ़ के नवाब ने 15 अगस्त 1947 को पाकिस्तान के साथ विलय पत्र पर हस्ताक्षर किए थे. यहां पर शासक मुस्लिम था तो बहुसंख्य जनता हिंदू. जूनागढ़ में नवाब मुहम्मद महाबत खान और दीवान शाहनवाज भुट्टो का रुख पहले से ही पाकिस्तान की ओर झुका हुआ था. मोहम्मद अली जिन्ना ने उन्हें बड़े-बड़े सपने दिखाए थे. वीपी मेनन ने 21 अगस्त को पाकिस्तान के उच्चायुक्त को पत्र लिखकर कहा कि जूनागढ़ भौगोलिक तौर पर पाकिस्तान से नहीं जुड़ा है, वहां बहुसंख्य जनता हिंदू है, लिहाजा वहां जनमत संग्रह कराया जाए.

भारत के पत्रों पर चुपचाप बैठा रहा पाकिस्तान
अशोक पांडे की किताब “कश्मीरनामा” कहती है, पाकिस्तान से कोई जवाब नहीं आने पर दोबारा पत्र भेजा गया. फिर जवाब नहीं आया. तब 12 सितंबर को प्रधानमंत्री नेहरू ने माउंटबेटन के चीफ ऑफ स्टाफ लॉर्ड इस्मे के जरिए सूचना भिजवाई कि भारत जनमत संग्रह के किसी भी फैसले को स्वीकार करने को तैयार है.

ये है पाकिस्तान का वो गलत नक्शा, जिसमें हर बार वो कश्मीर को तो अपना हिस्सा बताता ही है. साथ ही जूनागढ़ को भी अपना मानता है.

अगले ही दिन पाकिस्तान ने सूचना दी कि जूनागढ़ का विलय उसके साथ हो गया है. ये खबर आते ही जूनागढ़ की जनता उबलने लगी. वहां जनांदोलन शुरू हो गया. आसपास के राज्यों से भी इन आंदोलनों को समर्थन मिलने लगा. भारत पर कार्रवाई के लिए दबाव बढ़ने लगा. नेहरू और पटेल जानते थे कि इस मौके पर अगर युद्ध हुआ तो अंतरराष्ट्रीय समुदाय इसकी जिम्मेदारी भारत पर डालेगा.

ये भी किया जूनागढ़ नवाब ने 
लिहाजा भारत ने दूसरा रास्ता अपनाया. अगल बगल के राज्यों की सेनाओं को जूनागढ़ की सीमाओं पर तैनात कर दिया गया. वीपी मेनन को जूनागढ़ भेजकर नवाब को फिर जनमत संग्रह कराने पर रजामंद करने की कोशिश की गई. नवाब ने बीमारी का बहाना बनाकर मेनन से मिलने से मना कर दिया. साथ ही जूनागढ़ ने बाबरियावाड़ और मांगरोल पर भी अपना दावा ठोक दिया.

एक अक्टूबर 1947 को जूनागढ़ के नवाब ने मांगरोल पर कब्जा कर भी लिया. भारत ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री को फिर पत्र लिखा कि वो नवाब से कब्जा हटाने के लिए कहें. पाकिस्तान ने चालाकी करते हुए मांगरोल और बाबरियावाड़ के विलय की कानूनी पक्ष की जांच की मांग कर डाली. मांगरोल और वाबरियावाड दोनों ने भारत के साथ विलय पत्र पर साइन किए हुए थे.

जूनागढ़ की बहुसंख्य जनता किसी भी हालत में पाकिस्तान में नहीं जाना चाहती थी. बाद में जनमत संग्रह में उसने भारत में विलय पर ठप्पा भी लगाया.

नवाब अपना खजाना लेकर पाकिस्तान भाग गया
ऐसे में भारत ने तुरंत मांगरोल और बाबरियावाड़ का प्रशासन भारतीय सिविल सेवा के हाथों में दे दिया. साथ ही जूनागढ़ पर आर्थिक प्रतिबंध बढ़ा दिए. नवाब पहले ही सारा खजाना लेकर कराची जा चुका था. जूनागढ़ की हालत लगातार बिगड़ती जा रही थी.

जनता का गुस्सा भी बढ़ता जा रहा था. 27 अक्टूबर को दीवान भुट्टो को लग गया कि पाकिस्तान से कोई मदद नहीं मिलने वाली. उसे खुद भारत से प्रशासन हाथ में लेने की गुजारिश करनी पड़ी. इस बीच पांच नवंबर को रियासत का कामकाज एक स्टेट काउंसिल ने अपने हाथ में लिया.

भारतीय फौजों का प्रवेश और जनमत संग्रह
वीपी मेनन की पुस्तक “इंटीग्रेशन आफ इंडिया इनस्टेड” के अनुसार हालात और दबाव के आगे दीवान भुट्टो टूट चुके थे. इन्हीं हालात के बीच 09 नवंबर को भारतीय फौजें जूनागढ़ में प्रवेश कर गईं. नेहरू ने औपचारिक तौर पर इसकी सूचना पाकिस्तान के प्रधानमंत्री लियाकत अली खान को दी.

20 फरवरी 1948 को जूनागढ़ में भारत सरकार ने जनमत संग्रह कराया. कुल 2,01, 457 वोटरों में 1,90,870 ने अपने वोट डाले. पाकिस्तान के पक्ष में केवल 91 वोट पड़े. इस तरह जूनागढ़ भारत का अंग बन गया.

जब नेहरू ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री लियाकत को सूचित किया कि भारतीय फौजों ने जूनागढ़ को अपने नियंत्रण में ले लिया है तो उन्होंने इसे मानने से मना कर दिया

नेहरू के टेलीग्राम पर लियाकत खान का जवाब 
जानी मानी वेबसाइट जियोकरंट्स डॉट इंफो के अनुसार, भारतीय फौजों ने जूनागढ़ में प्रवेश किया तो नेहरू ने लियाकत अली को टेलीग्राम भेजा कि भारतीय फौजों ने जूनागढ़ प्रवेश कर लिया है ताकि वहां जनमत संग्रह कराया जा सके.

लियाकत ने जवाबी टेलीग्राम भेजा कि जूनागढ़ पाकिस्तान की टेरिटरी है, वहां केवल पाकिस्तान सरकार ही कुछ कर सकती है. उन्होंने ये भी कहा कि भारतीय फौजों ने पाकिस्तान टेरिटरी में घुसकर नियम तोड़ा है और अंतरराष्ट्रीय कानूनों का भी उल्लंघन किया है. पाकिस्तान सरकार ने जूनागढ़ में भारत की मौजूदगी का जमकर विरोध किया.

तब पाकिस्तान को कोई जवाब नहीं सूझा
एचवी हडसन की किताब “द ग्रेट डिवाइड” के अनुसार, गर्वनर जनरल माउंटबेटन ने किंग को इस बारे में रिपोर्ट भेजी. जब जिन्ना ने भारतीय फौजों की हलचल की शिकायत माउंटबेटन से की तो उनका जवाब टका सा था, जिसका सार यही था कि पाकिस्तान जो भी कर रहा है  वो भारत सरकार के साथ उसके समझौते का उल्लंघन है. पाकिस्तान निरुत्तर हो गया. बाद में जब ऐसी ही हरकत पाकिस्तान ने माणावदर (Manavadar) में की तो वहां भी उसे भारत की कार्रवाई का सामना करना पड़ा.

माउंटबेटन ने जब जूनागढ़ पर पाकिस्तान को दोटूक जवाब दिया और उसके तर्कों को आइना दिखाया तो जिन्ना के पास कोई जवाब नहीं था.

ये पाकिस्तान की केवल खीझ है
ये दोनों हार पाकिस्तान के लिए असहनीय थीं. उसने इस मामले को संयुक्त राष्ट्र में उठाने की कोशिश की लेकिन वहां उसके हाथ कुछ नहीं लगा. तब से पाकिस्तान आधिकारिक तौर पर जूनागढ़ और माणावदर  को अपना ही इलाका मानता है. उसने कभी भारत में इन इलाकों के विलय को स्वीकार नहीं किया. अपनी खीझ वो 72 साल से अपने आधिकारिक नक्शे में इन दोनों जगहों को शामिल करके जाहिर करता रहा है.

पाकिस्तान भागने वाले नवाब पर तो बहुत बुरी बीती 
रही बात जूनागढ़ के नवाब की तो उनके साथ पाकिस्तान में बहुत बुरी बीती. आज पाकिस्तान में उस नवाब के परिवार की हालत खराब है. उन्हें गुजारे के तौर पर महीने का जो पैसा मिलता है, वो चपरासी के वेतन से भी कम होता है. केवल 16 हजार रुपये.

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