हाल ही में पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस की अध्यक्षता वाली 7 जजों की बेंच ने एक निर्णय दिया है जिसमें पाकिस्तान सरकार को 2018 के एक प्रशासनिक आदेश “गिलगित बल्तिस्तान ऑर्डर 2018” में बदलाव कर गिलगित बाल्टिस्तान में चुनाव कराने की इजाजत दी है और आदेश के तहत चुनाव की प्रक्रिया के मध्य पाकिस्तान वहां अस्थायी सरकार भी बनवा सकता है.

भारत ने इस निर्णय पर कठोर प्रतिक्रिया देते हुए पाकिस्तान से कहा है कि पूरा जम्मू-कश्मीर, लद्दाख और गिलगित बाल्टिस्तान भारत का अविभाज्य अंग है. पाकिस्तान को उसके अवैध कब्जे में मौजूद हर क्षेत्र को तुरंत खाली करना चाहिए. पाकिस्तान सरकार या उसकी न्यायपालिका का अवैध और जबरन कब्जा है. इन इलाकों पर उसका कोई अधिकार नहीं है. भारत के विदेश मंत्रालय ने कहा कि पाकिस्तान की हालिया कार्रवाई जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के केंद्र शासित प्रदेशों के कुछ हिस्सों पर किये गए “अवैध कब्जों” को न तो छिपा सकती हैं और न ही इन क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के “मानव अधिकारों के हनन, शोषण और स्वतंत्रता से इनकार” कर सकती हैं, जो पिछले सात दशक से जारी है.

गिलगित बल्तिस्तान : 1947 से
उल्लेखनीय है कि पाकिस्तान ने कबायली हमले की आड़ में अपनी सेना द्वारा आक्रमण करा कर जम्मू और कश्मीर पर अधिकार करने की साजिश रची थी जिसके तहत अक्टूबर 1947 में बड़े पैमाने पर हमले किये गए. 26 अक्टूबर 1947 को जम्मू कश्मीर का भारत में विधिवत पूर्णत: विलय हो गया. परन्तु पाकिस्तान के संस्थापकों की सांप्रदायिक विषाक्त मानसिकता ने कुटिल चालों को नहीं छोड़ा. गिलगित-बाल्टिस्तान जो जम्मू-कश्मीर रियासत का हिस्सा था, जहां गिलगित स्काउट के स्थानीय कमांडर कर्नल मिर्ज़ा हसन खान ने पाकिस्तान की शह पर 2 नवंबर 1947 को बगावत कर गिलगित-बाल्टिस्तान की आज़ादी की घोषणा कर दी और 22 नवंबर 1947 को पाकिस्तान ने गिलगित-बाल्टिस्तान पर सेना की सहायता से अधिकार कर लिया. 27 अप्रैल 1949 तक गिलगित-बाल्टिस्तान पाक अधिक्रांत जम्मू कश्मीर का हिस्सा रहा और उसके बाद 28 अप्रैल को एक नई प्रशासनिक व्यवस्था अमल में लाई गई.

पाकिस्तान द्वारा अवैध रूप से अधिक्रांत किये गए इस क्षेत्र को 28 अप्रैल, 1949 को, दो अलग-अलग राजनीतिक इकाइयों में विभाजन कर दिया. इनमें से एक हिस्सा जो अपेक्षाकृत अधिक आबादी लेकिन कुल कब्जे वाले क्षेत्र का लगभग 15 प्रतिशत हिस्सा, जिसे पाकिस्तान ने ‘आजाद जम्मू और कश्मीर’ (AJK) नाम दिया , हालांकि चरित्र और व्यवहार में किसी भी प्रकार से इसे ‘आज़ाद’ या स्वतंत्र राज्य का दर्जा नहीं दिया गया था और पाकिस्तान की केन्द्रीय सरकार द्वारा प्रत्यक्ष रूप से और अत्यधिक कड़ाई के साथ प्रशासित किया जाता रहा. 1974 तक इस्लामाबाद में कश्मीर और उत्तरी क्षेत्रों (काना) के प्रभारी मंत्री और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली एक कार्यकारी परिषद के हाथों में इसके शासन सूत्र थे. दूसरा हिस्सा, तुलनात्मक रूप से कम आबादी वाला लेकिन पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले क्षेत्र का लगभग 85 प्रतिशत था- गिलगिट एजेंसी और बाल्टिस्तान से को जोड़कर, तथा इसे तथाकथित आज़ाद कश्मीर से अलग कर दिया गया और इसे ‘उत्तरी क्षेत्र’ का नाम दिया गया. इस क्षेत्र में कानून और व्यवस्था बनाये रखने के लिए पाकिस्तान की ओर से फ्रंटियर क्राइम रेगुलेशन (एफसीआर) के अंतर्गत लाया गया , जो पाकिस्तान के सीमावर्ती जनजातीय क्षेत्रों में कानून व्यवस्था बनाये रखने के नाम पर एक उत्पीड़क तंत्र था जो अंग्रेजों के भयावह औपनिवेशिक कानूनों की श्रृंखला का एक विस्तार था.

पाकिस्तान द्वारा गिलगित-बाल्टिस्तान पर अवैध रूप से अधिकार करने के बाद से आधिकारिक तौर पर नॉर्दर्न एरियाज या उत्तरी क्षेत्र के रूप में संदर्भित किया गया था. 2009 में पाकिस्तान की सत्ताधारी पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) सरकार ने एक आदेश जारी किया. ‘गिलगित-बाल्टिस्तान सशक्तीकरण और स्व-शासन आदेश (GBESGO)’ नाम के इस आदेश द्वारा इसका पुराना नाम गिलगित बल्तिस्तान दोबारा दे दिया गया.

2013 में पाकिस्तान मुस्लिम लीग की सरकार सत्ता में आई. नवाज़ शरीफ की सरकार इस क्षेत्र की प्रशासनिक व्यवस्था में परिवर्तन लाने के विषय में कार्य कर रही थी, पर भ्रष्टाचार सम्बन्धी मामलों में शरीफ के इस्तीफे के बाद यह कार्य शाहिद खाकान अब्बासी के नेतृत्व वाली पीएमएल-एन सरकार ने इस आदेश को निरस्त कर किया. इसके बाद नई व्यवस्था “गिलगित-बाल्टिस्तान आदेश, 2018 ” के रूप में सामने आई , जिसने स्थानीय शासन के विषय में निर्वाचित विधायिका को और अधिक शक्ति प्रदान करने का वादा किया, लेकिन, इस्लामाबाद स्थित केंद्र सरकार ने इस क्षेत्र पर अपना कठोर नियंत्रण बनाए रखने में किसी भी प्रकार की कोई रियायत नहीं की.भौगोलिक और प्रशासनिक वर्गीकरण
गिलगित-बाल्टिस्तान क्षेत्र का कुल भौगोलिक क्षेत्रफल 72,496 वर्ग किमी है. उल्लेखनीय है तत्कालीन सैन्य तानाशाह जनरल अयूब खान द्वारा चीन के साथ नजदीकी बढ़ाने के प्रयासों के रूप में 2 मार्च, 1963 को पाकिस्तान और चीन के बीच एक समझौता किया गया जिसके तहत, पाकिस्तान ने 5,180 वर्ग किमी क्षेत्र जिसे ट्रांस काराकोरम ट्रैक्ट या शक्स्गम घाटी भी कहा जाता है चीन को सौंप दिया. वर्तमान में गिलगित-बाल्टिस्तान को प्रशासनिक रूप से तीन डिवीजनों में विभाजित किया गया है जो कि 10 जिलों में बांटे गए हैं, जिनमें गिलगित, स्कर्दू, डायमर, घेसर, हुंजा, नगर, घांचे, अस्तोर, खरमंग और शिगू शामिल हैं. राजनीतिक गतिविधि के मुख्य केंद्र शहर हैं गिलगित, गेज़र और स्कर्दू. स्कर्दू पाकिस्तान सेना की उत्तरी लाइट इन्फैंट्री रेजिमेंट का मुख्यालय भी है, जो इस क्षेत्र को सैन्य नियंत्रण में रखने का एक उत्पीड़क उपकरण है.

पाकिस्तान द्वारा गहन आर्थिक शोषण
गिलगित-बाल्टिस्तान सबसे उपेक्षित, पिछड़ा और सबसे गरीब इलाका है. इस क्षेत्र में 85 प्रतिशत लोग निर्वाह कृषि से अपना जीवन यापन करते हैं. यद्यपि पाकिस्तान की आंकड़ों की बाजीगरी के चलते राज्य के आंकड़े गरीबी में रहने वाली आबादी कुल आबादी का केवल 23 प्रतिशत दर्शाते हैं. परन्तु वास्तविकता कहीं अधिक भयावह है. इस क्षेत्र की स्थानीय आबादी में स्थानीय आर्थिक बदहाली को लेकर व्यापक असंतोष व्याप्त है. इस संबंध में, अस्तोर सुप्रीम काउंसिल द्वारा 6 जून, 2017 को गिलगित में एक बहु-पक्षीय सम्मेलन आयोजित किया गया था जहां इस क्षेत्र के वक्ताओं ने पिछले सात दशकों से गिलगित-बाल्टिस्तान के लोगों को आर्थिक रूप से पिछड़े रखने के लिए इस्लामाबाद को जिम्मेदार ठहराया था. इसके अलावा, इस क्षेत्र को संवैधानिक दर्जा और बुनियादी मौलिक अधिकार प्रदान किए बिना अध्यादेशों के माध्यम से भारी कर आरोपित किये जाते रहे हैं. गिलगित-बाल्टिस्तान क्षेत्र में पहली प्रत्यक्ष कराधान नीति 2012 में पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) की युसूफ रजा गिलानी के नेतृत्व वाली सरकार द्वारा पेश की गई थी. इससे पहले, गिलगित-बाल्टिस्तान में अप्रत्यक्ष करों के माध्यम से ही वसूली की जाती रही थी. पीपीपी सरकार द्वारा यह प्रत्यक्ष कराधान नीति गिलगित-बाल्टिस्तान काउंसिल इनकम टैक्स (अनुकूलन) अधिनियम, 2012 नाम से एक अधिनियम का निर्माण कर लागू की गई. परन्तु शोषण की इस अवैध प्रणाली का गिलगित बल्तिस्तान के भीतर ही बड़े पैमाने पर विरोध किया गया है, जिन्होंने दुनिया भार में इस मामले की ओर ध्यान आकर्षित कराया.

कोविड-19 से भयानक रूप से प्रभावित होने के बावजूद पाकिस्तान जिस तरह से जम्मू कश्मीर में आतंकी गतिविधियों को भड़काने में लगा है, वह आश्चर्यजनक है. पाकिस्तान द्वारा नियंत्रण रेखा (एलओसी) पर संघर्ष विराम का उल्लंघन और जम्मू कश्मीर में घुसपैठ और आतंकवादी हमलों की लगातार बढ़ती हुई घटनाओं के चलते यह स्पष्ट होता जा रहा है कि पाकिस्तान एक बार फिर अपने मूल स्वभाव का अनुसरण कर रहा है. उल्लेखनीय है कि वर्ष (2020) के पहले तीन महीनों के दौरान, पाकिस्तान ने 1144 बार संघर्ष विराम उल्लंघन किया है. जबकि पिछले दो वर्षों अर्थात 2019 और 2018 में इसी अवधि में क्रमशः 685 और 627 उल्लंघन हुए थे.

इन लगातार बढ़ती आतंकी घटनाओं के साथ ही साथ इसी समय आने वाले सुप्रीम कोर्ट के निर्णय में गहन आंतरिक संबंध है और यह संबंध उसके गिलगिट बाल्टिस्तान में चुनाव कराने के अवैध षड्यंत्रों से भी जुड़ा हो सकता है. इस क्षेत्र को पाकिस्तान द्वारा अपने वैधानिक अधिकार में लेने के लिए उस पर चीन का भारी दबाव भी है, क्योंकि चीन CPEC जैसी परियोजना पर भारी मात्रा में धन निवेश कर बैठा है और इस क्षेत्र पर भारत की सरकार द्वारा उसके वैध दावों को लगातार वैश्विक मंचों पर उठाने के कारण चीन और पाकिस्तान भी गहन दबाव महसूस कर रहे हैं. पाकिस्तान इस कार्य में आगे बढ़ने से अब तक इसलिए संकोच करता रहा है, कि अगर वह ऐसा करता है तो वह भारत के विरुद्ध संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् के प्रस्तावों के उल्लंघन और कश्मीर पर उसके तथाकथित अवैध कब्जे को लेकर अक्सर संयुक्त राष्ट्र संघ और अन्य मंचों पर जो रुदन करता रहता है, के अवसरों से वंचित हो सकता है, जिससे उसकी आंतरिक और वैश्विक स्थितियों में बड़ा परिवर्तन आ सकता है. परन्तु वर्तमान स्थितियां कुछ और इंगित कर रहीं है जो आने वाले समय में इस इस निराश और विफल राष्ट्र की हताशा उसके अपरिपक्व कार्यों द्वारा अभिव्यक्त हो सकती हैं.

(लेखक पाकिस्तान संबंधी मामलो के विशेषज्ञ हैं . लेख में प्रस्तुत लेखक के निजी विचार हैं)

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